तुमने अपने खून से मेरे जिस्म को बनाया,
तुमने मुझे पाला-पोसा लेकिन साथ ना दे सके।
तुमने मुझे तहज़ीब सिखाई पर मोहब्बत ना सिखा पाए,
तुमने मेरी शरारत को पकड़ा,
गलतियों से मेरी उम्र का पता लगाया।
मेरे लफ्ज़ों से मेरी महफिल का अंदाज़ लगाया,
पर तुम मेरे अंधेरे कमरों की गूँज ना सुन पाए,
जो चीख-चीख कर मेरे अकेलेपन की गवाही दे रही थीं।
मेरी छुपती हुई आँखों में भारी-भारी बूँदों को ना देख पाए,
सुबह जब मेरे दरवाज़े पर दस्तक देते, तो तुम मेरी भीगी हुई तकियों को ना देख पाए।
बढ़ती हुई उम्र के साथ टूटती उम्मीदों को तुम ना देख पाए,
तुमने मुझे और घरों की तारीफ बताई पर मेरी काबिलियत को ना देख सके।
प्यार माँगने पर कुछ बनावटी ज़िम्मेदारियों से रू-ब-रू करवाया,
यह एहसान-ए-मोहब्बत इंसानियत पर जँचती नहीं,
इसके पीछे की तप्त (या पीड़ा) को मैं जानती हूँ।
मुझे भरोसा है उस खुदा पर,
जो मुझे हर पल बना रहा है।

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Simran Sharma
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