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The Poetic Land

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पिरूल

By Anuradha Semwal · अनुराधा सेमवाल

जेठ आते ही
चीड़ गिरा देता है अपनी सूखी पत्तियाँ,
जैसे कोई थका हुआ आदमी
उतार दे अपनी कमीज़।

पिरूल—
ढलानों पर बिछा भूरा सोना,
आग से
बस एक तीली भर दूर।

रात को पहाड़ जलते हैं
तो नीचे शहर वाले
मोबाइल उठाकर वीडियो बनाते हैं—
“वाह, कितना सुंदर लग रहा है!”

सुबह राख में मिलते हैं
काफल के झुलसे पेड़,
घुरड़ का एक बच्चा,
और चिट्ठी जैसी एक चुप्पी
जिसे कोई डाकिया
नीचे नहीं ले जाता।

होमस्टे में ठहरे टूरिस्ट
अख़बार में पढ़ते हैं—
“वनाग्नि: कारण और निवारण।”
फिर खिड़की से बाहर
धुएँ को देखते हैं
और समझ जाते हैं
कि अख़बार
हमेशा देर से छपता है।

मैं और गाँव की औरतें
सुबह से पिरूल बटोर रही हैं,
बोरियों में भरकर
आग से पहले
आग का रास्ता रोकने।

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About the Poet

Anuradha Semwal farms millets, rajma and potatoes on her family's terraced fields in a village above New Tehri, and runs a two-room homestay for trekkers. One of the few of her generation who stayed, she writes free verse about the hills, locked houses and the women who keep the villages alive.

अनुराधा सेमवाल नई टिहरी के ऊपर एक गाँव में अपने पुश्तैनी सीढ़ीदार खेतों पर मंडुवा, राजमा और आलू उगाती हैं और ट्रेकरों के लिए दो कमरों का होमस्टे चलाती हैं। अपनी पीढ़ी के उन गिने-चुने लोगों में से एक, जो गाँव में रुक गए, वे पहाड़ों, बंद घरों और गाँवों को ज़िंदा रखने वाली स्त्रियों पर मुक्त छंद लिखती हैं।

📍 New Tehri, Uttarakhand, India
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