जेठ आते ही
चीड़ गिरा देता है अपनी सूखी पत्तियाँ,
जैसे कोई थका हुआ आदमी
उतार दे अपनी कमीज़।
पिरूल—
ढलानों पर बिछा भूरा सोना,
आग से
बस एक तीली भर दूर।
रात को पहाड़ जलते हैं
तो नीचे शहर वाले
मोबाइल उठाकर वीडियो बनाते हैं—
“वाह, कितना सुंदर लग रहा है!”
सुबह राख में मिलते हैं
काफल के झुलसे पेड़,
घुरड़ का एक बच्चा,
और चिट्ठी जैसी एक चुप्पी
जिसे कोई डाकिया
नीचे नहीं ले जाता।
होमस्टे में ठहरे टूरिस्ट
अख़बार में पढ़ते हैं—
“वनाग्नि: कारण और निवारण।”
फिर खिड़की से बाहर
धुएँ को देखते हैं
और समझ जाते हैं
कि अख़बार
हमेशा देर से छपता है।
मैं और गाँव की औरतें
सुबह से पिरूल बटोर रही हैं,
बोरियों में भरकर
आग से पहले
आग का रास्ता रोकने।
Hindi · हिन्दी
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