बदरा घिरि आए, अँगनवा भीजै,
पिया बसे सूरत, जिया कइसे रीझै।
नीम की डरिया झुलवा डारा,
सखियाँ गावैं कजरी न्यारा,
हम बइठी देहरी पर सोचैं—
कौन घड़ी मिलि जाए किनारा।
बदरा घिरि आए, अँगनवा भीजै…
फोनवा मा तोहार मुँह देखा,
बीचहिं मा कटि जात है रेखा,
छत पर चढ़ि-चढ़ि नेटवा हेरी,
भीजि गई सब काजर-रेखा।
बदरा घिरि आए, अँगनवा भीजै…
अम्मा कहैं, धीरज धरु बिटिया,
भेजिहैं पइसा, बनी छपरिया,
पर पइसा से कब भरि पाई
सावन भर की सूनी कोठरिया?
बदरा घिरि आए, अँगनवा भीजै…
अबकी कातिक जो घर आओ,
गठरी नाहीं, खुद को लाओ।
बदरा घिरि आए, अँगनवा भीजै,
पिया बसे सूरत, जिया कइसे रीझै।
Hindi · हिन्दी
Related poems
भूलना होगाHindi PoemsMustafa khuje
तेरे इश्क़ में हमने क्या-क्या देखाHindi PoemsMustafa khuje
अगर हम दोबारा मिलेHindi PoemsAnchal Bhatiya
छत से दिल्लीHindi PoemsPrakhar Nagvanshi · प्रखर नागवंशी
डिलीवरीHindi PoemsPrakhar Nagvanshi · प्रखर नागवंशी
निर्मोही के दोहेHindi PoemsRameshwar Dubey 'Nirmohi' · रामेश्वर दुबे 'निर्मोही'





