किराये के कमरे की छत पर चढ़ो
तो दिल्ली
एक बहुत बड़े पिंजरे-सी दिखती है,
जिसकी हर सलाख़ पर
किसी का सपना
सूख रहा है।
सामने की छत पर
एक लड़की
रोज़ शाम अपने बाल सुखाती है
और नीचे सड़क को
ऐसे देखती है
जैसे वहाँ से
कोई गाँव
चलकर आने वाला हो।
गोरखपुर में
मेरे पिता
एक छोटा-सा स्कूल चलाते हैं।
फ़ोन पर पूछते हैं,
“दिल्ली कैसी है?”
मैं कहता हूँ, “बड़ी है।”
वे कहते हैं, “तुम भी बड़े हो जाओगे।”
मैं छत से नीचे देखता हूँ—
इतनी बड़ी दिल्ली में
मैं
चालीस रुपये के छोले-कुलचे जितना हूँ।
धुआँ है,
धूल है,
हॉर्न है।
पर रात ग्यारह के बाद,
जब सब थककर बैठ जाता है,
आख़िरी मेट्रो
पुल पर से गुज़रती है
और उसकी रोशनी
पूरे मोहल्ले की खिड़कियों पर
एक पल को
सपना छोड़ जाती है।
हम सब
उसी एक पल के लिए
यहाँ आए हैं।





