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The Poetic Land

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सखुआ फूला है

By Jyoti Minj · ज्योति मिंज

सरहुल आने वाला है।
सखुआ के पेड़ों पर
फूल ऐसे लदे हैं
जैसे जंगल ने
अपनी सबसे अच्छी साड़ी पहन ली हो।

आयो कहती थी—
पेड़ से पहले पूछना पड़ता है,
फिर डाल तोड़ना।
मैं हँसती थी।
अब शहर के अस्पताल में
किसी मरीज़ की नस ढूँढ़ने से पहले
मैं भी मन ही मन पूछती हूँ—
“इजाज़त है?”

गाँव में पाहन
घड़े का पानी देखकर
बताते हैं
कि इस बरस बारिश कैसी होगी।
मेरी रिपोर्टों में
ऐसा कोई घड़ा नहीं,
बस नंबर हैं, ग्राफ़ हैं,
और हर रात
किसी माँ की
अधूरी नींद।

इस बार छुट्टी मिली
तो गाँव जाऊँगी,
जूड़े में सखुआ का फूल खोंसूँगी,
और नाचूँगी उस घेरे में
जहाँ कोई नहीं पूछता
कि तुम किस भाषा में
सपने देखती हो।

जंगल जानता है।
जंगल को
हर भाषा आती है।

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About the Poet

Jyoti Minj is a staff nurse at a hospital in Ranchi and spends her leave in her family's village near Gumla. Her poems carry the sal forests, Sarhul and the long quiet of hospital night shifts.

ज्योति मिंज राँची के एक अस्पताल में स्टाफ़ नर्स हैं और छुट्टियाँ गुमला के पास अपने गाँव में बिताती हैं। उनकी कविताओं में सखुआ के जंगल, सरहुल और अस्पताल की रात की ड्यूटी की लंबी चुप्पी है।

📍 Ranchi, Jharkhand, India
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