न हयात अच्छी, न वफ़ात अच्छी,
वजूद न होता तो होती कुछ बात अच्छी।
उम्र जो गुज़री अफ़सुर्दगी, आशुफ़्तगी में,
न वो मेरे दिन अच्छे, न वो रात अच्छी।
ख़ुद से बिछड़कर क्या मिला करे किसी से,
न ऐसी महफ़िल अच्छी, न मुलाक़ात अच्छी।
बाज़ार-ए-ज़िंदगी में ये बात हुई साबित,
भीख में जो मिले न वो सौग़ात अच्छी।
मुस्तफ़ा,तेरा दिल और तन्हाइयाँ उरूज पर,
न ज़िंदाँ की ज़ंजीर अच्छी, न नजात अच्छी।

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Mustafa khuje
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