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The Poetic Land

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सायबाँ नहीं मिलता

By Naved Alam 'Shafaq' · नवेद आलम 'शफ़क़'

तमाम शहर में अपना मकाँ नहीं मिलता,
जो दिल की बात कहे, वो बयाँ नहीं मिलता।

गली-गली में हैं रौशन हज़ार विज्ञापन,
मगर चराग़ का कोई निशाँ नहीं मिलता।

किराए के इन्हीं कमरों में उम्र गुज़री है,
कहीं भी नीम-सा वो सायबाँ नहीं मिलता।

हर एक मोड़ पे मिलते हैं लोग हँसते हुए,
किसी की आँख में पर इत्मीनाँ नहीं मिलता।

ज़मीन बेच के ऊँची इमारतें तो बनीं,
परिंदा ढूँढता है, आसमाँ नहीं मिलता।

‘शफ़क़’ ये शाम भी ढल जाएगी कहीं चुपचाप,
किसी को अपना यहाँ राज़दाँ नहीं मिलता।

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About the Poet

Naved Alam 'Shafaq' is a branch manager at a cooperative bank in Bhopal and spends his evenings by the Bada Talab. He writes Hindi ghazals in plain, conversational language about cities, mothers and unhurried love.

नवेद आलम 'शफ़क़' भोपाल के एक सहकारी बैंक में शाखा प्रबंधक हैं और शामें बड़े तालाब के किनारे बिताते हैं। वे बोलचाल की सीधी भाषा में शहर, माँ और ठहरे हुए प्रेम पर हिंदी ग़ज़लें कहते हैं।

📍 Bhopal, Madhya Pradesh, India
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