Skip to main content

The Poetic Land

TYPE AT LEAST 3 CHARACTERS TO SEARCH...

गिरमिट की चिट्ठी

By Shailendra Boodhun · शैलेन्द्र बूधन

परदादा की कोई चिट्ठी नहीं है।
वे लिखना नहीं जानते थे,
सिर्फ़ गन्ना काटना जानते थे,
और रामायण की चौपाइयाँ,
जो उन्होंने आरा के किसी गाँव से
जहाज़ पर छिपाकर लाईं—
एक पोटली में,
सत्तू के साथ।

तो मैं ही लिखता हूँ
उनकी तरफ़ से
एक चिट्ठी,
जो कभी नहीं गई:

“माई,
इहाँ समुंदर बहुत बड़ा है,
अपनी गंगा जी से भी बड़ा।
साहेब कहे रहे पाँच बरस,
अब नौ हो गए।
पीठ पर कोड़ों के निसान
गन्ने की गाँठों जैसे उभर आए हैं।
पर साँझ को हम सब
बैठका में ढोलक बजाते हैं,
और जब ‘राम-लखन’ गाते हैं
तो लगता है
भोजपुर यहीं कहीं
किसी पेड़ के पीछे बैठा है।”

आज मेरी कक्षा में
बच्चे हिंदी पढ़ते हैं,
क्रियोल में हँसते हैं,
फ़्रेंच में गिनती करते हैं।
मैं उन्हें ‘माई’ शब्द पढ़ाता हूँ
और हर बार
मेरी आवाज़ थोड़ी-सी
समुंदर पार चली जाती है।

आप्रवासी घाट की सीढ़ियाँ
सोलह हैं।
हर साल दो नवंबर को
मैं उन्हें गिनने जाता हूँ—
जैसे कोई
घर लौटने की
उलटी गिनती।

Poet Image

About the Poet

Shailendra Boodhun teaches Hindi at a state secondary school in Mahébourg, Mauritius. A descendant of indentured labourers from Bhojpur, he writes poems about girmitiya memory, sugarcane fields and the language his students carry forward.

शैलेन्द्र बूधन मॉरीशस के माहेबर्ग में एक सरकारी माध्यमिक विद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं। भोजपुर से आए गिरमिटिया मज़दूरों के वंशज शैलेन्द्र गिरमिट की स्मृति, गन्ने के खेतों और उस भाषा पर कविताएँ लिखते हैं जिसे उनके विद्यार्थी आगे ले जा रहे हैं।

📍 Mahébourg, Mauritius
Facebook
X
LinkedIn
Threads
WhatsApp

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *