परदादा की कोई चिट्ठी नहीं है।
वे लिखना नहीं जानते थे,
सिर्फ़ गन्ना काटना जानते थे,
और रामायण की चौपाइयाँ,
जो उन्होंने आरा के किसी गाँव से
जहाज़ पर छिपाकर लाईं—
एक पोटली में,
सत्तू के साथ।
तो मैं ही लिखता हूँ
उनकी तरफ़ से
एक चिट्ठी,
जो कभी नहीं गई:
“माई,
इहाँ समुंदर बहुत बड़ा है,
अपनी गंगा जी से भी बड़ा।
साहेब कहे रहे पाँच बरस,
अब नौ हो गए।
पीठ पर कोड़ों के निसान
गन्ने की गाँठों जैसे उभर आए हैं।
पर साँझ को हम सब
बैठका में ढोलक बजाते हैं,
और जब ‘राम-लखन’ गाते हैं
तो लगता है
भोजपुर यहीं कहीं
किसी पेड़ के पीछे बैठा है।”
आज मेरी कक्षा में
बच्चे हिंदी पढ़ते हैं,
क्रियोल में हँसते हैं,
फ़्रेंच में गिनती करते हैं।
मैं उन्हें ‘माई’ शब्द पढ़ाता हूँ
और हर बार
मेरी आवाज़ थोड़ी-सी
समुंदर पार चली जाती है।
आप्रवासी घाट की सीढ़ियाँ
सोलह हैं।
हर साल दो नवंबर को
मैं उन्हें गिनने जाता हूँ—
जैसे कोई
घर लौटने की
उलटी गिनती।
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