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The Poetic Land

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संगम के कवित्त

By Rameshwar Dubey 'Nirmohi' · रामेश्वर दुबे 'निर्मोही'

(१)
भोर होत संगम पे, घंटा बजे शंख बजे,
गंगा जी के पानी बीच दीप झिलमिलाएँ।
माथे पे चंदन लिए पंडा जी पुकार रहे,
नाव वाला मोलभाव करके मुसकाए।
चाय की केतली खौले, कुल्हड़ में सोंधी गंध,
बूढ़े बाबा ठंड में भी रोज़ किस्से सुनाएँ।
कहत ‘निर्मोही’ सुनो, दुनिया के मेले बीच
जो भी आया संगम पे, खाली हाथ न जाए॥

(२)
एक कमरे में आठ लड़के हैं तैयारी में,
दीवार पे नक़्शे टँगे, चूल्हे पे खिचड़ी है।
अम्मा फोन करे, पूछे, “बेटवा, कब बनोगे
बड़े अफ़सर तुम?” उत्तर में मौन है।
आठ साल बीत गए, फ़ॉर्म भरे सौ-सौ बार,
बाल झड़े, चश्मा चढ़ा, फिर भी हौसला है।
कहत ‘निर्मोही’ यहाँ सपनों की मंडी लगी,
हारे हुए लड़कों की आँखों में भी जोत है॥

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About the Poet

Rameshwar Dubey 'Nirmohi' served 22 years in the Indian Army as a havildar and now runs a small stationery and photocopy shop near the university in Prayagraj, where students drop in as much for his dohas as for their photocopies. He writes geet, dohe and kavitt in a Hindi that slips easily into Awadhi.

रामेश्वर दुबे 'निर्मोही' बाईस साल भारतीय सेना में हवलदार रहे और अब प्रयागराज में विश्वविद्यालय के पास स्टेशनरी और फ़ोटोकॉपी की छोटी-सी दुकान चलाते हैं, जहाँ छात्र फ़ोटोकॉपी के साथ-साथ उनके दोहे सुनने भी आते हैं। वे गीत, दोहे और कवित्त लिखते हैं, जिनकी हिंदी सहज ही अवधी में ढल जाती है।

📍 Prayagraj, Uttar Pradesh, India
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