(१)
भोर होत संगम पे, घंटा बजे शंख बजे,
गंगा जी के पानी बीच दीप झिलमिलाएँ।
माथे पे चंदन लिए पंडा जी पुकार रहे,
नाव वाला मोलभाव करके मुसकाए।
चाय की केतली खौले, कुल्हड़ में सोंधी गंध,
बूढ़े बाबा ठंड में भी रोज़ किस्से सुनाएँ।
कहत ‘निर्मोही’ सुनो, दुनिया के मेले बीच
जो भी आया संगम पे, खाली हाथ न जाए॥
(२)
एक कमरे में आठ लड़के हैं तैयारी में,
दीवार पे नक़्शे टँगे, चूल्हे पे खिचड़ी है।
अम्मा फोन करे, पूछे, “बेटवा, कब बनोगे
बड़े अफ़सर तुम?” उत्तर में मौन है।
आठ साल बीत गए, फ़ॉर्म भरे सौ-सौ बार,
बाल झड़े, चश्मा चढ़ा, फिर भी हौसला है।
कहत ‘निर्मोही’ यहाँ सपनों की मंडी लगी,
हारे हुए लड़कों की आँखों में भी जोत है॥





