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The Poetic Land

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रानी बेटी

By Pari Mahajan

वक़्त से पहले हालातों की ज़ंजीरों ने सहना सिखा दिया,

बचपन खो दिया, बोझ ज़िम्मेदारी का था।

माँ-बाबा कैसे रहेंगे आगे,

जब बेटी दुल्हन बन दूसरे घर चली जाएगी?

फिर वह कभी-कभी मेहमान कहलाती,

ससुराल वालों की इजाज़त से अपने ही घर आएगी।

“दो दिन रह लिया है अब,

ससुराल वापस कब जाएगी?”

“अच्छा नहीं लगता मायके में रुकना,

बाबा की इज़्ज़त चली जाएगी।”

रानी बेटी नाज़ों से पली है,

महलों के राजा के घर हर त्योहार पर

वह दासी बन सजाएगी।

माँ के घर पर वह पायल की आवाज़,

वह हँसी की खिलखिलाहट,

केवल यादें ही रह जाएँगी।

दूसरे का घर संभालती बेटी,

अपना घर कब बनाएगी?

न भाई का, न पति का,

उसका और उसके माँ-बाप का घर।

फिर वह सच्ची मुस्कुराहट से सजेगी,

जब-जब माँ से मिलने की इच्छा होगी,

वह किसी के आगे नहीं गिड़गिड़ाएगी।

रानी बेटी है…

राजा बेटे का फ़र्ज़ भी ख़ुद ही निभाएगी।

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About the Poet

Pari Mahajan is a 17-year-old humanities student from Jammu who finds home in writing poems, quotes, and short stories daily.

📍 jammu, India
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