Skip to main content

The Poetic Land

TYPE AT LEAST 3 CHARACTERS TO SEARCH...

धोरों का गीत

By Hemlata Paliwal · हेमलता पालीवाल

धोरों पे चाँदनी बिछी, ऊँटों की घंटी बोले,
रेत कहे, पगली, सुन ले, मन की गाँठें खोले।

दादी की ओढ़णी जैसी फैली साँझ सुनहरी,
पनिहारी के गीतों में सदियों की प्यास ठहरी,
बूँद-बूँद को तरसे जो, वो ही सबसे ज़्यादा
बादल का मोल तौले।
धोरों पे चाँदनी बिछी…

कोई परदेसी आया, सोने-सा किला देखा,
फ़ोटो लेकर लौट गया, पढ़ी न माथे की रेखा,
जिन हाथों ने जाली काटी, उन हाथों की हथेली
अब भी छाले टटोले।
धोरों पे चाँदनी बिछी…

हवा मिटा देती है हर दिन क़दमों की सब निशानी,
फिर भी हर दिन चलती है बंजारों की कहानी,
जो खोने से न डरता, उसको ही रेत सिखाती
कैसे जग में डोले।
धोरों पे चाँदनी बिछी, ऊँटों की घंटी बोले।

Poet Image

About the Poet

Hemlata Paliwal runs a small school of Hindustani vocal music in Jaipur. She composes pads in Braj and songs of the Rajasthani desert for her students to sing.

हेमलता पालीवाल जयपुर में हिंदुस्तानी गायन का एक छोटा-सा विद्यालय चलाती हैं। वे अपने विद्यार्थियों के गाने के लिए ब्रज भाषा में पद और राजस्थान के रेगिस्तान के गीत रचती हैं।

📍 Jaipur, Rajasthan, India
Facebook
X
LinkedIn
Threads
WhatsApp

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *