धोरों पे चाँदनी बिछी, ऊँटों की घंटी बोले,
रेत कहे, पगली, सुन ले, मन की गाँठें खोले।
दादी की ओढ़णी जैसी फैली साँझ सुनहरी,
पनिहारी के गीतों में सदियों की प्यास ठहरी,
बूँद-बूँद को तरसे जो, वो ही सबसे ज़्यादा
बादल का मोल तौले।
धोरों पे चाँदनी बिछी…
कोई परदेसी आया, सोने-सा किला देखा,
फ़ोटो लेकर लौट गया, पढ़ी न माथे की रेखा,
जिन हाथों ने जाली काटी, उन हाथों की हथेली
अब भी छाले टटोले।
धोरों पे चाँदनी बिछी…
हवा मिटा देती है हर दिन क़दमों की सब निशानी,
फिर भी हर दिन चलती है बंजारों की कहानी,
जो खोने से न डरता, उसको ही रेत सिखाती
कैसे जग में डोले।
धोरों पे चाँदनी बिछी, ऊँटों की घंटी बोले।
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