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⏳ 12 मिनट • 🗣️ Hindi

अपना खाता

By Kavyanjali Mehrotra · काव्यांजलि मेहरोत्रा

कहानी “अपना खाता” का चित्र

THE HOOK: अम्मा ने कहा, घर बेच रहे हैं। तीनों बच्चे अपना-अपना हिसाब लेकर रकाबगंज पहुँचे — पर काले बक्से में रखी लाल बही में पचास बरस का एक दूसरा हिसाब लिखा था, हाशिये में, जिसे कभी किसी ने नहीं पढ़ा।

अम्मा ने फ़ोन पर बस इतना कहा था, “घर बेच रहे हैं। शनिवार को आ जाओ, सब लोग। बात करनी है।” और फ़ोन रख दिया था। अम्मा फ़ोन ऐसे ही रखती हैं, जैसे चूल्हे पर से उबलता दूध उतार रही हों — बात पूरी हो गई, अब और खौलाने से फ़ायदा नहीं।

मैं कानपुर से सुबह की इंटरसिटी पकड़कर आई। चारबाग़ से रकाबगंज तक का रिक्शा अब डेढ़ सौ माँगता है। मैंने सौ कहा, उसने एक सौ बीस, और हम दोनों एक-दूसरे को ऐसे देखते रहे जैसे पुराने दुश्मन किसी शादी में मिल गए हों। एक सौ बीस में बात तय हुई। लखनऊ में मोल-भाव भी तहज़ीब से हारा जाता है।

गली वही थी। नुक्कड़ पर हकीम साहब के दवाख़ाने की जगह अब मोबाइल रिचार्ज की दुकान है, पर उसके ऊपर का पुराना बोर्ड किसी ने उतारा नहीं — ‘दवाख़ाना शफ़ा’ के आधे अक्षर अब भी झाँकते हैं। हमारा घर गली का चौथा मकान है। हरा दरवाज़ा, जिस पर हर दीवाली पापा ख़ुद पेंट करते थे और हर दीवाली पेंट दरवाज़े से ज़्यादा उनके कुर्ते पर लगता था। पापा को गए ग्यारह बरस हो गए। दरवाज़ा अब मटमैला हरा है, जैसे किसी ने हरे रंग को बहुत दिनों तक धूप में बिठाकर भूल गया हो।

भीतर आँगन में अम्मा तख़्त पर बैठी मटर छील रही थीं। अठहत्तर की उम्र में भी उनकी उँगलियाँ फली को ऐसे खोलती हैं जैसे किसी चिट्ठी का लिफ़ाफ़ा — एक झटके में, बिना फाड़े।

“आ गईं, सुधा? रास्ते में कुछ खाया?”

“हाँ अम्मा।”

“झूठ। चेहरा बता रहा है। रसोई में पराठे रखे हैं।”

अम्मा से झूठ बोलना वैसा ही है जैसे इनकम टैक्स वालों से — वे पहले से जानते हैं, बस आपकी हिम्मत नापते हैं।

* * *

भैया दोपहर तक गुड़गाँव से अपनी गाड़ी में आए। राजीव भैया अब किसी बड़ी कंपनी में ‘वाइस प्रेसिडेंट’ हैं; किस चीज़ के, यह आज तक मुझे ठीक से समझ नहीं आया। गली में गाड़ी घुसी नहीं, तो उन्होंने उसे नुक्कड़ पर छोड़ा और दोनों हाथों में मिठाई के डिब्बे लिए ऐसे चलकर आए जैसे कोई मंत्री उद्घाटन करने आया हो। पीछे-पीछे भाभी, फ़ोन पर किसी से अंग्रेज़ी में नाराज़।

मनोज, हमारा छोटा, जो कभी लखनऊ से निकला ही नहीं, अमीनाबाद में इलेक्ट्रिकल की दुकान चलाता है और इसी घर की ऊपर वाली मंज़िल पर बीवी-बच्चों के साथ रहता है। वह चाय की ट्रे लेकर सीढ़ियों से उतरा और सबको ऐसे देखा जैसे वह मेज़बान भी है और मुलज़िम भी।

चाय के पहले घूँट के साथ ही भैया ने बात छेड़ दी। भैया हर बात पहले घूँट के साथ छेड़ते हैं; उनके हिसाब से दूसरे घूँट तक लोग नरम पड़ जाते हैं।

“देखो अम्मा, फ़ैसला बिल्कुल सही है। मैंने एक प्रॉपर्टी डीलर से बात भी कर ली है। इस लोकेशन पर अच्छा पैसा मिलेगा। तीन हिस्से कर लेंगे, आपका हिस्सा फ़िक्स्ड डिपॉज़िट में डाल देंगे, और आप हमारे साथ गुड़गाँव चलिए। वहाँ सोसाइटी में पार्क है, लिफ़्ट है, डॉक्टर पास में है।”

“और मनोज?” मैंने पूछा।

“मनोज अपने हिस्से से कहीं फ़्लैट ले लेगा। इंदिरा नगर, गोमती नगर। आजकल यही तो चलता है।”

मनोज ने कप नीचे रखा। “भैया, दुकान अमीनाबाद में है।”

“तो? स्कूटर है न।”

मनोज चुप हो गया। मनोज हमेशा चुप हो जाता है, फिर रात को छत पर जाकर अकेले सिगरेट पीता है और सुबह तक उसकी चुप्पी पूरे मोहल्ले को सुनाई देने लगती है।

भाभी बोलीं, “और सुधा दीदी, आपका हिस्सा तो जीजाजी के काम आ जाएगा न? वो कानपुर वाली दुकान का लोन…”

मेरी आँखें अपने-आप अम्मा की तरफ़ गईं। अम्मा मटर छीलती रहीं। मैंने भाभी को देखा और मुस्कुरा दी — वही मुस्कान जो लखनऊ की औरतें तब देती हैं जब उन्हें कहना होता है, ‘बीबी, अपनी हद में रहिए।’

सच यह था कि मेरे दिमाग़ में भी एक हिसाब चल रहा था। बेटी का एडमिशन, उसके पापा का लोन, और वह छोटी-सी इच्छा कि एक बार, बस एक बार, किसी चीज़ के लिए किसी से न पूछना पड़े। हम तीनों के पास अपनी-अपनी गणित थी। और तीनों के सवाल में ‘अम्मा’ कहीं बीच में किसी कोष्ठक की तरह बंद थीं।

अम्मा ने आख़िरी फली छीली, छिलकों को अख़बार में लपेटा और बोलीं, “बात कल करेंगे। आज खाना खाओ। मनोज की बहू ने कोफ़्ते बनाए हैं।”

भैया कुछ कहना चाहते थे, पर कोफ़्तों का ज़िक्र आते ही उनका चेहरा ढीला पड़ गया। कुछ लड़ाइयाँ रसोई से हारी जाती हैं।

* * *

रात को अम्मा ने मुझसे कहा, “सुधा, ऊपर वाली कोठरी से मेरा काला बक्सा उतरवा दे। उसमें कुछ कागज़ हैं, डीलर-वीलर को दिखाने पड़ेंगे।”

काला बक्सा। हम बचपन में उसे ‘ख़ज़ाना’ कहते थे, क्योंकि अम्मा उसे हमेशा ताले में रखती थीं और चाबी अपनी साड़ी के पल्लू में बाँधकर। उसमें ख़ज़ाने के नाम पर निकला — पुराने बिजली के बिल, पापा की पेंशन की फ़ाइल, मकान की रजिस्ट्री, मेरी और भैया की मार्कशीटें, मनोज का एक सर्टिफ़िकेट जो उसे पाँचवीं में ‘सबसे साफ़ बच्चा’ होने के लिए मिला था, और सबसे नीचे, लाल कपड़े में लिपटी, एक मोटी बही।

लाल बही। लंबी, पतली, जैसी बनिये की दुकानों पर होती है, जिल्द पर हल्दी के दाग़ और किनारों पर चूहों की कुतरी हुई लकीरें। मुझे याद आया — अम्मा हर रात सबके सो जाने के बाद लालटेन की रोशनी में, बाद में बल्ब की रोशनी में, इसी में कुछ लिखती थीं। हम समझते थे दूध-राशन का हिसाब है। था भी।

पहला पन्ना: ‘श्री गणेशाय नमः। घर ख़र्च — १९७४।’

मैं वहीं कोठरी के फ़र्श पर बैठ गई।

‘दूध — ३६ रु. महीना। सब्ज़ी — ४२ रु.। मिट्टी का तेल — ८ रु.। राजीव की फ़ीस — १५ रु.।’

और उसी पंक्ति के आगे, हाशिये में, छोटे-छोटे अक्षरों में, जैसे कोई बात दबे पाँव निकलकर बैठ गई हो: ‘अम्मा जी ने आज फिर कहा कि मायके से दहेज़ में बर्तन हल्के आए थे। कुछ नहीं कहा।’

मैंने पन्ना पलटा।

‘गेहूँ — ६० रु.। चीनी — ११ रु.। सुधा का फ़्रॉक — ७ रु.।’ हाशिये में: ‘अपनी चप्पल अगले महीने।’

अगले महीने के पन्ने पर चप्पल नहीं थी। उसके अगले महीने भी नहीं। तीन महीने बाद लिखा था: ‘चप्पल — मोची से सिलवाई, १ रु.। नई की ज़रूरत नहीं।’

मैं पढ़ती गई। पचास बरस की गृहस्थी, रुपये-आने-पैसों में। और हर पन्ने के हाशिये में एक दूसरी बही, जिसका हिसाब किसी ने कभी नहीं माँगा।

‘१९७९ — मनोज हुआ। अस्पताल — २२० रु.। इन्होंने कहा, फिर लड़का, अच्छा है। सास ने कहा, लड़की होती तो इसी की तरह कुछ बोलती नहीं। हँसी आई।’

‘१९८३ — बेगम अख़्तर का रिकॉर्ड चौक में देखा। ३५ रु.। नहीं लिया। अगले साल।’

‘१९८४ — रिकॉर्ड — अगले साल।’

‘१९८६ — राजीव की कोचिंग। रिकॉर्ड — बाद में।’

‘१९९१ — बड़ी ननद की बेटी की शादी में अपनी बनारसी दे दी। इन्होंने कहा, तुम्हारे पास तो और हैं। एक ही थी।’

‘१९९४ — सुधा की शादी। गहने: अपने कंगन, अपनी माँ की हँसुली। सुधा के ससुर ने पूछा, बस इतना? इन्होंने कुछ नहीं कहा। मैंने भी नहीं।’

मुझे याद है उस दिन। मुझे याद है मैं घूँघट के भीतर से अम्मा की कलाइयाँ देख रही थी और सोच रही थी कि अम्मा के हाथ इतने हल्के क्यों लग रहे हैं। आज, इकतीस साल बाद, कोठरी के फ़र्श पर बैठकर पता चला।

‘२००२ — छत की मरम्मत। अपनी एफ़.डी. तोड़ी। किसी को नहीं बताया।’

‘२००९ — राजीव ने कहा, अम्मा आप ये हिसाब-किताब क्यों रखती हो, आजकल सब कंप्यूटर पर होता है। हाँ बेटा।’

‘२०१४ — इनका देहांत। अस्पताल — …’ आगे की रक़म लिखी थी, कटी थी, फिर लिखी थी। हाशिये में सिर्फ़ इतना: ‘अब किसके लिए बचाऊँ?’

उसके बाद के पन्नों पर हिसाब छोटे होते गए। एक आदमी का दूध, एक आदमी की सब्ज़ी। पोते-पोतियों के जन्मदिन पर पाँच सौ, हज़ार। मनोज की दुकान के लिए बीस हज़ार — ‘वापस नहीं माँगना।’ भैया के फ़्लैट की गृहप्रवेश पूजा में ग्यारह हज़ार — ‘बहू ने कहा, अम्मा आप क्यों तकलीफ़ करती हैं। ले लिए।’ मेरे लिए — ‘सुधा के बेटी की कॉलेज फ़ीस — १५,०००। सुधा से न कहना, उसके आदमी को बुरा लगेगा।’

मुझे लगा था वो पंद्रह हज़ार किसी पुरानी पॉलिसी के थे। अम्मा ने यही कहा था।

सबसे आख़िरी लिखा हुआ पन्ना पिछले महीने का था। अक्टूबर। हिसाब के नीचे, हाशिये में नहीं, बीचोंबीच, बड़े अक्षरों में:

‘अठहत्तर बरस। अपने लिए कुछ नहीं लिखा। अब लिखूँगी।’

* * *

सुबह नाश्ते पर भैया ने डीलर का नंबर निकाला। “अम्मा, ग्यारह बजे आ रहा है वो। एक बार घर देख लेगा।”

“बुलाओ,” अम्मा ने कहा। “देख ले।”

मनोज का चेहरा उतर गया। मैंने बही अपनी गोद में दबा रखी थी, दुपट्टे के नीचे, जैसे कोई चोरी का माल। पूरी रात सोचती रही थी कि इसे सबके सामने रख दूँ, कि भैया की आँखों में डालकर पूछूँ — ये ग्यारह हज़ार याद हैं? पर सुबह होते-होते समझ आ गया कि यह बही मेरी नहीं है। अम्मा ने इसे पचास बरस किसी को नहीं दिखाया। मुझे भी नहीं दिखाया था। मैं बस कोठरी में बैठी एक बेटी थी जिसने ग़लती से किसी की डायरी पढ़ ली।

ग्यारह बजे डीलर आया। सफ़ेद जूते, सुनहरी घड़ी, और बात-बात में ‘मैडम जी, ये तो सोने की लोकेशन है।’ उसने कमरों की लंबाई नापी, आँगन देखकर ‘अरे वाह’ कहा, सीढ़ियों पर ‘थोड़ा काम माँगेगी’ कहा, और फिर तख़्त के सामने खड़े होकर एक रक़म बताई।

भैया की आँखें चमक गईं। मनोज ने ज़मीन देखी। मैंने अम्मा को देखा।

अम्मा ने डीलर को पानी का गिलास दिया। “बेटा, ऊपर की दो कोठरियाँ और देख लो। उनमें अलग से ग़ुसलख़ाना है न, वो।”

डीलर ऊपर गया, लौटा। “हाँ मैडम जी, बढ़िया है।”

“किराये पर कितना उठ जाएँगी? लड़कियों को। कॉलेज वाली।”

आँगन में ऐसा सन्नाटा छा गया कि मनोज की बहू के हाथ से गिरी चम्मच की आवाज़ भी किसी धमाके जैसी लगी।

डीलर ने अपनी सुनहरी घड़ी देखी, जैसे जवाब उसमें लिखा हो। “जी… यहाँ से कॉलेज पास है… दोनों मिलाकर नौ-दस हज़ार आराम से।”

“बारह,” अम्मा ने कहा। “बिजली अलग। खाना चाहें तो मनोज की बहू से तय कर लें, उसका अलग।”

“अम्मा!” भैया उठ खड़े हुए। “ये क्या बात हुई? आपने तो कहा था बेचना है।”

“मैंने कहा था घर बेच रहे हैं,” अम्मा ने शांति से कहा। “ये नहीं कहा था कौन बेच रहा है। तुम लोग तो कब से बेच रहे थे, मन ही मन। मैंने सोचा, सबको बुला लूँ, सबका हिसाब एक बार सामने आ जाए।”

डीलर ने स्थिति भाँप ली। लखनऊ के डीलर भी आख़िर लखनऊ के होते हैं। “मैडम जी, कोई बात नहीं, मैं फिर आ जाऊँगा। जब भी… आप बताइएगा।” और सफ़ेद जूते गली में ग़ायब हो गए।

भैया देर तक बोलते रहे। सिक्योरिटी, बुढ़ापा, अकेलापन, ‘लोग क्या कहेंगे कि वाइस प्रेसिडेंट की माँ किराया वसूल रही है’। भाभी ने बीच-बीच में ‘हमारी तो बस आपकी फ़िक्र है’ जोड़ा। अम्मा सुनती रहीं, हर बात पर सिर हिलाती रहीं, जैसे कोई मास्टरनी किसी बच्चे की ग़लत पर पूरे आत्मविश्वास से पढ़ी गई कविता सुन रही हो।

आख़िर में बोलीं, “राजीव, तुम्हारी फ़िक्र मेरे सिर-माथे। पर अब मुझे अपनी फ़िक्र करने दो। बहुत दिन दूसरों की कर ली।”

फिर उन्होंने मनोज की तरफ़ देखा। “और तुम, इतना मुँह मत लटकाओ। ऊपर वाला घर तुम्हारा ही है, जब तक मैं हूँ, और उसके बाद का हिसाब भी मैंने लिख रखा है। वकील के पास।”

मनोज की आँखें भर आईं। उसने मुँह फेर लिया और ज़ोर से चाय सुड़कने लगा, जैसे चाय में कोई बहुत ज़रूरी बात छिपी हो।

फिर अम्मा मेरी तरफ़ मुड़ीं, और धीरे से, बस मुझे सुनाई दे इतना, बोलीं, “और तुम, मेरी बही वापस बक्से में रख देना। दुपट्टे में दबाकर कोई चोरी नहीं छिपती।”

मेरे गाल जल उठे। अम्मा मुस्कुराईं — वो मुस्कान जिसे मैं पचास बरस से ‘अम्मा की नाराज़गी’ समझती आई थी, और जो असल में शायद हमेशा से कुछ और थी।

* * *

शाम को भैया-भाभी लौट गए। जाते-जाते भैया ने अम्मा के पाँव छुए और कहा, “कोई दिक़्क़त हो तो फ़ोन करना।” अम्मा ने कहा, “तुम भी।” भैया एक पल को रुके, जैसे इस बात का मतलब समझने की कोशिश कर रहे हों, फिर मिठाई के ख़ाली डिब्बे लेकर गली में निकल गए।

मेरी ट्रेन अगली सुबह थी। रात को मैं अम्मा के पास तख़्त पर लेटी। आँगन के ऊपर आसमान का एक चौकोर टुकड़ा था, जिसमें नवंबर की धुंध के पीछे दो तारे लुका-छिपी खेल रहे थे।

“अम्मा, किराये के पैसों का क्या करोगी?”

अम्मा बहुत देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “चौक में अब भी वो रिकॉर्ड वाली दुकान है, पता है? अब रिकॉर्ड नहीं बेचता, सी.डी. बेचता है, और वो भी कोई नहीं लेता। पर मैंने पूछा था। बोला, ग्रामोफ़ोन मँगवा दूँगा, पुराना, चलता हुआ।”

मैं हँस पड़ी। हँसी कब रुलाई में बदली, पता नहीं चला। अम्मा ने अँधेरे में मेरा सिर अपनी गोद में खींच लिया, जैसे मैं बावन की नहीं, बारह की हूँ।

“और एक बनारसी,” अम्मा ने कहा। “लाल नहीं। हरी। तेरे बाप के दरवाज़े जैसी, जब नया पेंट होता था।”

अगली सुबह, निकलने से पहले, मैंने काला बक्सा खोला, लाल बही उसमें रखने के लिए। रखने से पहले, आदत से मजबूर, आख़िरी पन्ना खोल लिया।

अक्टूबर वाले पन्ने के आगे एक नया पन्ना था, कल रात का। ऊपर, अम्मा की टेढ़ी-मेढ़ी पर पक्की लिखावट में:

‘अपना खाता — नवंबर।’

नीचे पहली पंक्ति: ‘आमदनी — किराया, दो कोठरी — १२,००० रु. (अगले महीने से)।’

और उसके नीचे, ख़र्च वाले कॉलम में, बिना किसी ‘अगले साल’ के:

‘बेगम अख़्तर।’

हाशिया ख़ाली था।

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About the Author

Kavyanjali Mehrotra (b. 1984) teaches Hindi at a girls' inter college in Lucknow's Aminabad. She writes about the families of old Lucknow mohallas, especially the women who keep the accounts nobody else reads.

काव्यांजलि मेहरोत्रा (जन्म 1984) लखनऊ के अमीनाबाद में लड़कियों के एक इंटर कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं। पुराने लखनऊ के मोहल्लों के परिवार, और ख़ासकर वे औरतें जिनका हिसाब कोई नहीं पढ़ता, उनकी कहानियों के केंद्र में रहते हैं।

📍 Lucknow, India

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