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The Poetic Land

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⏳ 10 मिनट • 🗣️ Hindi

इमली के नीचे की चिट्ठियाँ

By Kamini Lata Prasad · कामिनी लता प्रसाद

कहानी “इमली के नीचे की चिट्ठियाँ” का चित्र

THE HOOK: सुवा में छियानवे साल की आजी के पलंग के नीचे से गिरमिट के ज़माने का एक टीन का बक्सा निकलता है। उसमें सात चिट्ठियाँ हैं, जिन्हें सौ साल में किसी ने नहीं पढ़ा — फिर भी सब जानते हैं कि उनमें क्या लिखा है।

सुवा में बारिश बताकर नहीं आती। सुबह आसमान ऐसा नीला था जैसे किसी ने धोकर टाँग दिया हो, और ग्यारह बजते-बजते नाबुआ की हमारी गली में पानी टीन की छतों पर ढोलक बजाने लगा। मैं रात की ड्यूटी से लौटी थी, आँखें जल रही थीं, और आजी अपने कमरे के दरवाज़े पर खड़ी थीं, हाथ कमर पर।

“मीना, तुम लोग हमके ऐसे उठाता जइसे गन्ना के गट्ठर उठाता। हम अभी ज़िंदा है, बोलो तो चल के जाएगा।”

छियानवे साल की हैं आजी। लौटोका वाले मामा के घर से हम उन्हें अपने घर ला रहे थे, क्योंकि मामा की कमर जवाब दे गई थी और मामी का धीरज। मैंने कहा, “आजी, कोई आपको उठा नहीं रहा। बस सामान उठा रहे हैं।”

“सामान भी हमार है। पूछ के उठाओ।”

मेरी बेटी रिया, सोलह की, हेडफ़ोन गले में लटकाए, एक कार्टन लिए खड़ी थी। आजी ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा। “ई कौन? हमार परपोती? इतना लंबा कब हो गया? कुछ खिलाता नहीं तुम लोग, खाली लंबा हो रहा है।”

रिया हँसी। आजी को देखकर सब हँसते हैं, फिर बाद में पता चलता है कि उन्होंने कुछ बहुत चुभता हुआ कह दिया था।

* * *

पलंग खिसकाया तो नीचे से वह बक्सा निकला। टीन का, हरा रंग जो अब आधा भूरा हो गया था, कोनों पर जंग के फूल, और ढक्कन पर कील से खुरचकर लिखे दो अक्षर, जो किसी लिपि के थे पर हिंदी के नहीं लगते थे। रिया ने उसे खींचना चाहा तो आजी ने बेंत ज़मीन पर ठोकी।

“धीरे! ऊ बक्सा हमार माई के साथ जहाज़ पे आया। समुंदर नहीं तोड़ा, तुम मत तोड़ो।”

हम तीनों फ़र्श पर बैठ गए। बाहर बारिश, अंदर पंखे की कराह। आजी ने ढक्कन उठाया तो एक गंध निकली — कपूर, पुराना कपड़ा, और कुछ ऐसा जिसे मैं आज तक नाम नहीं दे पाई। शायद सौ साल। सबसे ऊपर एक पीतल का लोटा था, पिचका हुआ, चमक कब की उतर चुकी। उसके नीचे लाल कपड़े में लिपटी एक छोटी-सी रामायण की गुटका, जिसके पन्ने छूते ही झरने को तैयार थे। फिर एक काँच की चूड़ी नहीं, पीतल का पतला कड़ा, जिस पर बारीक बेल खुदी थी। और सबसे नीचे, एक मोमजामे में बँधे, सात-आठ पीले पड़ चुके काग़ज़।

“ई का है, आजी?” रिया ने पूछा। वह फ़िजी बात थोड़ी-थोड़ी बोलती है, जैसे कोई नई चप्पल पहनकर चलता है।

“चिट्ठी,” आजी ने कहा, और कुछ देर कुछ नहीं कहा।

* * *

मेरी परनानी, आजी की माई, का नाम फुलमतिया था। बस्ती ज़िले के किसी गाँव से थी — गाँव का नाम आजी को कभी पक्का नहीं रहा, कभी कुछ बतातीं, कभी कुछ। सन उन्नीस सौ तेरह के आसपास कलकत्ता के डिपो से जहाज़ पकड़ा। सत्रह की थीं, अकेली। आरकाटी ने उनसे कहा था कि फ़िजी कलकत्ता के पास ही है, पाँच साल काम करोगी, सोना लेकर लौटोगी।

आजी उस शाम खाने के बाद, बरामदे में अपनी कुर्सी पर बैठकर, बताने लगीं। रिया ने फ़ोन नीचे रख दिया, जो अपने आप में एक घटना थी।

“हमार माई बोले, जहाज़ पे तीन महीना रहा। ऊपर पानी, नीचे पानी, बीच में आदमी लोग उल्टी करता। एक लड़की बगल में सोता रहा, बीच में मर गया, उसको चादर में लपेट के समुंदर में डाल दिया। माई बोले, ऊ दिन से हम समुंदर का पानी नहीं पीता, ऊ में हमार सहेली है।”

रिया ने धीरे से कहा, “समुंदर का पानी तो कोई नहीं पीता, आजी।”

“चुप रहो। कहानी हम बोल रहा है।”

“फिर नौसोरी के पास एक कोठी में डाल दिया। लाइन बोलता रहा उसको। एक लंबा टीन का घर, बीच-बीच में दीवार, हर खाना में एक परिवार। औरत लोग कम रहा, आदमी लोग बहुत। माई बोले, चालीस औरत, सौ आदमी। सोचो, केतना झगड़ा।” आजी ने हाथ से एक घेरा बनाया, जैसे झगड़ा अभी उनके सामने हो रहा हो। “कुलंबर घोड़ा पे आता, सरदार डंडा लेके। सुबह चार बजे से खेत। एक दिन का काम पूरा नहीं हुआ तो पैसा काट। माई बोले, ई कंटराक नहीं, नरक है।”

* * *

दूसरे दिन मैं अस्पताल गई, सी.डब्ल्यू.एम. में मेरी शिफ़्ट थी। वार्ड में एक बूढ़े ईताउकेई बाबा थे जिनकी साँस उखड़ रही थी, और उनकी बेटी उनके कान में कुछ गा रही थी। मैंने ड्रिप ठीक की और सोचती रही कि फुलमतिया की सहेली को समुंदर में डालते वक़्त किसी ने कुछ गाया होगा या नहीं।

लौटी तो देखा रिया ने बक्से की सारी चीज़ें मेज़ पर सजा दी थीं और हर एक की फ़ोटो खींच रही थी। आजी पास बैठी उसे डाँट रही थीं, पर मुस्कुराकर।

“ई कड़ा किसका है, आजी?” रिया ने पूछा।

आजी ने कड़ा उठाया, उँगलियों में घुमाया। उनकी उँगलियाँ अब टेढ़ी हो गई हैं, पर उस कड़े को उन्होंने ऐसे पकड़ा जैसे अभी भी किसी की कलाई पहचानती हों।

“ई मुनसामी दिया रहा।”

मैंने पहली बार यह नाम सुना। रिया ने मेरी तरफ़ देखा, मैंने कंधे उचका दिए।

* * *

“मुनसामी मदरासी रहा,” आजी बोलीं। उस रात बिजली चली गई थी, लालटेन जली थी, और आजी की आवाज़ लालटेन की लौ जैसी काँपती, फिर सीधी हो जाती। “दूसरा जहाज़ से आया, मदरास से। हम लोग का जहाज़ कलकत्ता का, ऊ लोग का मदरास का। ऊ लोग का बोली अलग, खाना अलग, भगवान भी थोड़ा अलग। माई बोले, पहले-पहले हम लोग उनके हँसता रहा — ई लोग का बोलता, जइसे नरियल में कंकड़ हिलाता।”

“फिर?”

“फिर का। खेत में एक लाइन में काटता रहा। माई का हँसिया खराब, हाथ कट गया। मुनसामी अपना गमछा फाड़ के बाँध दिया। एक्को बात नहीं बोला, काहे कि माई ओकर बात नहीं समझता, ऊ माई के नहीं। बस बाँध दिया और फिर काटे लगा।”

आजी हँसीं। “माई बोले, ओ दिन से हम दोनों के बीच में एक नया बोली बना। आधा हमार, आधा ओकर, आधा कुलंबर के अंगरेज़ी।”

“आधा-आधा-आधा तो तीन आधा हो गया,” रिया ने कहा।

“हाँ, प्यार में हिसाब नहीं चलता,” आजी ने कहा, और रिया चुप हो गई।

मैंने सोचा, हम जो बोलते हैं — यह फ़िजी बात, जिसे इंडिया वाले रिश्तेदार सुनकर हँसते हैं कि तुम लोग हिंदी ग़लत बोलते हो — शायद ऐसे ही गन्ने के खेतों में, कटे हाथों पर बँधे गमछों में बनी होगी। किसी ने व्याकरण नहीं लिखा। बस ज़रूरत थी कि कोई किसी से कह सके — दर्द हो रहा है, पानी लो, कल मिलेगा।

* * *

फुलमतिया और मुनसामी का प्यार दो साल चला। आजी के हिसाब से — “तीन बरसात” — जो फ़िजी में दो साल ही होते हैं। रात को लाइन के पीछे इमली के पेड़ के नीचे मिलते। सरदार को पता चला तो उसने दोनों को अलग करवा दिया। मुनसामी को वनुआ लेवु भेज दिया गया, लबासा की किसी कोठी में। और फुलमतिया की शादी सरदार ने उसी के जहाज़ के रामदीन से तय कर दी, जो उससे पंद्रह साल बड़ा था और जिसके बारे में आजी ने बस इतना कहा, “बढ़िया आदमी रहा। चुप रहता।” रामदीन मेरे परनाना थे।

“लेकिन चिट्ठी?” रिया ने पूछा। “ई चिट्ठी कौन लिखा?”

“मुनसामी। लबासा से। गन्ना के जहाज़ वाला एक आदमी लाता रहा। सात चिट्ठी। सात साल। हर साल एक।”

“क्या लिखा है?”

आजी ने लालटेन की तरफ़ देखा। “ई तो हम नहीं जानता।”

“मतलब?”

“ऊ मदरासी में लिखा। माई पढ़ नहीं सकता रहा, न मदरासी, न हिंदी। हम भी नहीं।” उन्होंने कंधे उचकाए, बिल्कुल रिया की तरह, जैसे सौ साल पुराने किसी इशारे को पहचान लिया हो। “माई बोले, पढ़ने का का ज़रूरत? हम जानता ऊ का लिखा। हर चिट्ठी आता, माई इसको छाती से लगा के बैठता, और फिर हमके बताता — ई में लिखा है कि लबासा में बारिश बहुत है। ई में लिखा है कि ओकर गाय बच्चा दिया। ई में लिखा है कि ऊ अभी भी इमली के पेड़ के याद करता।”

“तो वो अपने मन से बनाती थी?”

“बनाता नहीं,” आजी ने कहा, और उनकी आवाज़ में वह धार आ गई जो अस्पताल में डॉक्टरों को भी चुप करा देती है। “जानता था।”

* * *

आजी को नया कमरा पसंद नहीं आया। खिड़की से आम का पेड़ दिखता है, उन्हें इमली चाहिए थी। पंखे की आवाज़ से उन्हें लगता है कोई रो रहा है। हमने पंखा बदल दिया, खिड़की का पर्दा बदल दिया। आम का पेड़ नहीं बदल सकते थे। आजी ने कहा, “ठीक है, आम भी चलेगा। हम लोग फ़िजी में आ के सब चला लिया, आम क्या चीज़।”

उस हफ़्ते रिया हर शाम स्कूल से आकर आजी के पास बैठती। मैं किचन से सुनती रहती — आजी कभी गिरमिट की बात बतातीं, कभी अपनी जवानी की, जब वे बा के बाज़ार में पहली बार साड़ी के ऊपर कार्डिगन पहनकर गई थीं और पूरी सड़क ने देखा था। कभी रिया उन्हें अपने फ़ोन पर कुछ दिखाती और आजी कहतीं, “ई सब जादू है, हम नहीं मानता,” और फिर दस मिनट तक देखती रहतीं।

एक शाम मैंने सुना, रिया पूछ रही थी, “आजी, आपको गुस्सा नहीं आता? आपकी माई की शादी ज़बरदस्ती हुई।”

आजी कुछ देर चुप रहीं। फिर बोलीं, “गुस्सा? गुस्सा के का करेगा? ऊ टाइम में सब ज़बरदस्ती रहा। जहाज़ ज़बरदस्ती, खेत ज़बरदस्ती, ई देस ज़बरदस्ती। पर माई बोले — एक चीज़ कोई ज़बरदस्ती नहीं ले सकता। ऊ चिट्ठी, ऊ कड़ा। ऊ हमार रहा।” फिर उन्होंने हँसकर जोड़ा, “और तुम्हार परनाना भी बढ़िया रहा। माई के कभी नहीं पूछा, ई बक्सा में का है।”

* * *

आज रविवार है। बारिश रुकी हुई है, आम के पेड़ से पानी टपक रहा है। रिया अपने कमरे से निकली, सीधी आजी के पास गई, और बिना किसी भूमिका के बोली, “आजी, ई बक्सा हमके दे दो।”

मैं रसोई के दरवाज़े पर रुक गई। आजी ने चश्मा नाक पर नीचे खिसकाया, जैसे कोई जज फ़ैसला सुनाने वाला हो।

“काहे? तुमको पुराना टीन का का करना?”

“मैं इसे रखूँगी। अपने कमरे में। और…” रिया थोड़ा हिचकी, “मैंने चिट्ठियों की फ़ोटो एक ऐप में डाली थी। वो तमिल है, आजी। ऐप पढ़ सकता है। मेरी क्लास में एक लड़की है, कविता, उसकी नानी तमिल पढ़ती हैं। हम सही से पढ़ा सकते हैं।”

कमरे में बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला। आम के पेड़ से एक बूँद खिड़की के शीशे पर गिरी।

आजी ने बक्से की तरफ़ देखा। फिर रिया की तरफ़। उनकी आँखें गीली नहीं थीं; आजी की आँखें कभी गीली नहीं होतीं, वे बस और तेज़ हो जाती हैं।

“ले जाओ,” उन्होंने कहा। “एक शर्त है।”

“क्या?”

“पढ़ा लो। फिर हमके सुनाओ। हम मरने से पहले एक दफे सुनना चाहता, मुनसामी का बोला।” उन्होंने बेंत रिया के घुटने पर हल्के से रखी। “लेकिन सुनो। अगर ऊ में कुछ और लिखा है — बारिश नहीं, गाय नहीं, इमली नहीं — तो हमके झूठ बोलना।”

रिया ने उनकी तरफ़ देखा।

“हमार माई कभी झूठ नहीं बोला,” आजी ने कहा। “ओकर बात झूठ नहीं होना चाहिए।”

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About the Author

Kamini Lata Prasad (b. 1981) is a nurse in Suva, Fiji. A fourth-generation descendant of girmitiya sugar-cane workers, she writes in Hindi with the music of Fiji Baat, about families stretched across oceans and a hundred years.

कामिनी लता प्रसाद (जन्म 1981) फ़िजी की राजधानी सुवा में नर्स हैं। गिरमिटिया गन्ना-मज़दूरों की चौथी पीढ़ी से आने वाली कामिनी फ़िजी बात की लय वाली हिंदी में समुंदरों और सौ बरसों में फैले परिवारों की कहानियाँ लिखती हैं।

📍 Suva, Fiji

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