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एक चोर

By Naman Bindal

ek chor feature image

THE HOOK: Story Synopsis: A Thief is a heartwarming short story about an unusual relationship between a homeowner and a mysterious thief who sneaks into his house every night to eat homemade desserts. Instead of confronting each other, they begin communicating through handwritten notes left beneath a bowl of sweets. What starts as a petty theft slowly transforms into a quiet exchange of wit, kindness, and unspoken understanding. In the end, the thief finds a job, leaves behind a small gift, and reminds the narrator—and the reader—that humanity can sometimes emerge in the most unexpected places.

एक रात, जब मैं गहरी नींद में सो रहा था, एक चोर मेरे घर के अंदर घुस आया। वह सीधा रसोईघर गया और फ्रिज में खाना ढूँढ़ने लगा। रात का बचा हुआ हलवा—जो मैंने सोचा था अगली सुबह खाऊँगा—वह मज़े से खा गया।

अगले दिन जब मैंने फ्रिज खोला और हलवा नहीं पाया, तो मुझे समझ ही नहीं आया कि यह कैसे हो गया। शायद मैंने कल पूरी कटोरी खा ली होगी। मन तो अब भी था खाने का, तो मैंने फिर से हलवा बनाया और वापस एक कटोरी फ्रिज में रख दी। जब सोने गया तो चैन नहीं पड़ा। मैं पास वाले कमरे में बैठकर फ्रिज पर निगरानी करने लगा।

थोड़ी देर बाद वही चोर फिर से आया। लंबी कद-काठी, कोई चौबीस-पच्चीस साल का होगा। उसका चेहरा रुमाल से ढका हुआ था, पर फिर भी उसकी आँखें मुझे बिल्कुल साफ़ दिखाई दे रही थीं। हाथ काँप ज़रूर रहे थे, पर आँखों में ज़रा सा भी डर नहीं था। उसने ज़रा सा झुककर फ्रिज खोला, हलवा खाया और चला गया। मैंने सब कुछ देखा, पर कुछ बोला नहीं। मुझमें हिम्मत नहीं हुई—क्या पता वह मुझ पर हमला कर दे।

पर मुझे कुछ न कुछ करना ही था। मैंने सोचा, अगर मैं हलवे की कटोरी के नीचे एक नोट रख दूँ—

“मैंने तुम्हें देख लिया है।”

—तो शायद डर के मारे वह दोबारा न आए। अपनी इस तरकीब से खुश होकर मैंने फिर हलवा बनाया, नोट लिखा, कटोरी के नीचे रखा और सो गया।

अगली सुबह उठा। फ्रिज खोला तो हलवा वहीं था। मुझे लगा, काम बन गया। पर उसके नीचे एक दूसरा नोट रखा था। मैंने पढ़ा तो हलवे की कटोरी मेरे हाथों से गिर गई—

“कल खीर मिल सकती है क्या?”

मुझे बहुत गुस्सा आया, पर समझ नहीं आया क्या करूँ। मैंने खुद को शांत किया, खीर बनाई और उसके नीचे फिर एक नोट लिखकर रख दिया—

“देखो, तुम फिर आए तो मैं पुलिस को बुला लूँगा।”

अगले दिन खाली कटोरी के नीचे फिर एक नोट था—

“क्या कहोगे पुलिस को? कोई हलवा खा गया?
पुलिस तुम्हें ही मारकर भगा देगी।
हाँ, और कल रसमलाई।”

बात तो सही थी। इतनी छोटी चोरी के लिए पुलिस वैसे भी मदद नहीं करती।

अब क्या? शायद उसे कुछ और चाहिए। मैंने रसमलाई मँगवाई और फिर एक नोट लिखा—

“तो बताओ, फिर तुम यहाँ वापस न आने के बदले क्या लोगे?”

पर अगले दिन वह चोर आया ही नहीं। पहले मुझे खुशी हुई, फिर थोड़ी झुँझलाहट भी हुई। ऐसे कैसे—मुझसे रसमलाई मँगवाकर आया ही नहीं? मैंने रसमलाई कूड़े में फेंक दी और खाली कटोरी के नीचे एक और नोट लिखकर सो गया—

“कल मैंने रसमलाई मँगवाई थी। तुम नहीं आए, तो मैंने कूड़े में फेंक दी।
आज कुछ नहीं मिलेगा, और आगे भी नहीं।
अब से मत आना।”

सुबह उठा तो लगा—मैं कितना पागल हूँ। चोरों से बातें कर रहा हूँ। मैं वापस खाने को कुछ बनाने लगा कि तभी देखा—कल वह आया था और एक और नोट छोड़कर गया था—

“हाँ, मैं नहीं आऊँगा। मेरी नौकरी लग गई है।
कल उसी सिलसिले में रात भर बाहर था।
बस एक आख़िरी बार अगर हलवा फिर से मिल जाता, तो अच्छा होता।”

यह पढ़कर मुझे न जाने क्या हुआ। मैंने वह नोट कूड़े में फेंक दिया। एक कटोरी हलवा बनाया, फ्रिज में रखा और बाहर चला गया। नोट लिखने का मन नहीं हुआ।

अगले दिन जब फ्रिज खोला, तो कटोरी में बर्फ़ी का एक टुकड़ा रखा हुआ था। नीचे एक नोट था—

“आज हलवा उतना अच्छा नहीं था।”

मैंने बर्फ़ी का एक छोटा सा टुकड़ा खाया। शायद आज तक उससे ज़्यादा मीठा कुछ नहीं खाया था। बाकी टुकड़ा वापस उसी कटोरी में रखा और बिस्तर पर जाकर गहरी नींद में सो गया।

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About the Author

Naman Bindal is an Indian writer with published works, known for crafting emotionally engaging stories that blend realism, subtle humor, and the beauty of everyday life.

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