कालका से छूटने वाली आख़िरी गाड़ी में देवीदत्त को खिड़की वाली सीट मिल गई, और इसी बात पर वह मन ही मन ख़ुश हो लिया। सैंतालीस बरस की उम्र में आदमी छोटी-छोटी जीतों से काम चलाना सीख जाता है। चंडीगढ़ में बोर्ड की कॉपियों की जाँच का पाँच दिन का काम निपटा था, कमर अकड़ी हुई थी, और झोले में बेटी के लिए एक प्लास्टिक का ग्लोब था, जो हर बार डिब्बा हिलने पर अंदर से खड़खड़ा उठता।
नवंबर की शाम जल्दी उतरती है। धरमपुर के बाद ही रोशनी पहाड़ों की पीठ से फिसलकर नीचे खड्डों में जा चुकी थी, और डिब्बे की पीली बत्ती में शीशे पर बस अपना ही चेहरा दिखता था — थका हुआ, चश्मा नाक पर सरका हुआ, कनपटी पर सफ़ेदी। देवीदत्त ने आँखें मूँद लीं।
जब खुलीं, गाड़ी किसी छोटे हॉल्ट पर खड़ी थी। एक लालटेन जैसी बत्ती, टीन की छत, और एक तख़्ती जिस पर सफ़ेद अक्षरों में लिखा था: कोठीधार।
देवीदत्त ने यह नाम पहले कभी नहीं पढ़ा था। बीस साल से वह इस लाइन पर आता-जाता था, सोलन के स्कूल से छुट्टियों में घर और घर से वापस, और उसे लगता था कि हर स्टेशन का नाम उसकी ज़बान पर है। पर पहाड़ में हॉल्ट बनते-मिटते रहते हैं। उसने सोचा, शायद नया होगा।
तभी वह लड़की चढ़ी।
* * *
दस-ग्यारह साल की रही होगी। नीला पिनाफ़ोर, उसके नीचे सफ़ेद कमीज़ जिसके कॉलर नुकीले थे, सफ़ेद मोज़े घुटनों तक, काले जूते जिन पर पॉलिश की चमक थी। दो चोटियाँ, लाल रिबन में बँधी। और हाथ में एक काला छाता, बंद, जिसके सिरे से पानी टपक रहा था — टप, टप — डिब्बे के लकड़ी के फ़र्श पर।
बाहर बारिश नहीं हो रही थी। देवीदत्त ने शीशे से देखा था। आसमान साफ़ था, ठंडा, तारों वाला।
लड़की उसके सामने वाली सीट पर बैठ गई, छाता दोनों घुटनों के बीच खड़ा करके, और बड़े सलीक़े से बोली, “नमस्ते अंकल जी।”
“नमस्ते, बेटा।”
“अंकल जी, अगला स्टेशन कौन-सा है?”
देवीदत्त मास्टर था; बच्चों के सवालों का जवाब देना उसकी आदत थी, जैसे किसी को छींक आने पर ‘जीते रहो’ कहना। “अगला… सोलन से पहले वाला। कुमारहट्टी।” फिर उसने ख़ुद को टोका — कुमारहट्टी तो पीछे छूट गया होगा। “नहीं, अब तो सीधे सोलन आएगा।”
लड़की ने सिर हिलाया, जैसे यह जवाब उसे पहले भी मिल चुका हो, और खिड़की से बाहर देखने लगी।
देवीदत्त ने ग़ौर किया कि उसके बस्ते पर — कैनवस का खाकी बस्ता, चमड़े की पट्टियों वाला — किसी स्कूल का बिल्ला सिला था, जिसका रंग उड़ चुका था। ऐसे बस्ते अब कोई नहीं लेता। उसकी अपनी बेटी पहिये वाला गुलाबी बैग घसीटती है।
“अकेली जा रही हो?”
“जी। मम्मी स्टेशन पर लालटेन लेकर आती हैं।”
लालटेन। देवीदत्त मुस्कराया। पहाड़ी गाँवों में अब भी लोग बहुत कुछ पुराने ढंग से करते हैं।
गाड़ी चली, और एक सुरंग में घुस गई।
* * *
सुरंगें इस लाइन की आदत हैं। सौ से ऊपर हैं, किसी ने गिनी हैं, देवीदत्त ने कभी नहीं गिनीं। हर सुरंग में डिब्बे की बत्ती एक बार झपकती है, पहियों की आवाज़ दोगुनी होकर लौटती है, और भीतर की हवा में अचानक कोयले और गीली चट्टान की गंध भर जाती है, जबकि कोयले के इंजन यहाँ बरसों से नहीं चलते।
सुरंग से निकलते ही गाड़ी धीमी हुई और रुक गई। लालटेन जैसी बत्ती। टीन की छत। तख़्ती: कोठीधार।
देवीदत्त ने चश्मा उतारकर पोंछा और फिर से पहन लिया। कोठीधार।
“अंकल जी,” लड़की ने उतने ही सलीक़े से पूछा, “अगला स्टेशन कौन-सा है?”
“यह… यह तो वही है,” उसने कहा, और अपनी आवाज़ उसे किसी और की लगी। “गाड़ी शायद पीछे गई होगी। कभी-कभी शंटिंग होती है।”
पर उसे पता था कि इस लाइन पर इस तरह शंटिंग नहीं होती।
उसने डिब्बे में नज़र घुमाई। कालका से जब गाड़ी चली थी, डिब्बा भरा हुआ था — एक नवविवाहित जोड़ा जो हर मोड़ पर सेल्फ़ी ले रहा था, मूँगफली की टोकरी वाला एक लड़का, ऊनी टोपी में एक बूढ़ी अम्मा जो बार-बार अपनी पोटली गिनती थी, दो फ़ौजी, और पीछे की सीट पर कोई आदमी जो अख़बार चेहरे पर डाले सो रहा था।
जोड़ा अब नहीं था। फ़ौजी नहीं थे।
उसे याद नहीं आया कि वे कब उतरे।
* * *
दूसरी सुरंग लंबी थी। इतनी लंबी कि देवीदत्त ने अपनी साँसें गिननी शुरू कर दीं, जैसे वह बचपन में मंडी के पास अपनी नानी के गाँव में अँधेरी गोठ से गुज़रते हुए गिनता था। चालीस। पचास। बत्ती झपकी, और झपकती रही। अँधेरे में लड़की के छाते से पानी टपकने की आवाज़ साफ़ सुनाई देती रही — टप, टप — और देवीदत्त को लगा कि वह आवाज़ पहियों की लय से मेल नहीं खाती, किसी और लय में चल रही है, किसी और घड़ी में।
उसने अपनी कलाई देखी। घड़ी सात बजकर दस मिनट पर रुकी थी।
सुरंग ख़त्म हुई। लालटेन। टीन की छत। कोठीधार।
मूँगफली वाला लड़का नहीं था। अम्मा नहीं थी। उसकी पोटली सीट पर रखी थी, बँधी हुई, और देवीदत्त ने उसे छूने की हिम्मत नहीं की।
“अंकल जी, अगला स्टेशन कौन-सा है?”
इस बार देवीदत्त ने लड़की को ठीक से देखा। उसका चेहरा साधारण था — गोल, गेहुँआ, नाक पर एक छोटा-सा तिल, ठंड से लाल गाल। डरावना कुछ नहीं था। बस उसकी आँखें खिड़की की ओर नहीं, उसकी ओर थीं, और उनमें एक ऐसा धीरज था जो दस साल के बच्चों में नहीं होता। वह धीरज किसी ऐसे का था जिसने एक ही सवाल बहुत, बहुत बार पूछा हो, और जिसे अब जवाब की उम्मीद कम, आदत ज़्यादा हो।
“तुम्हारा नाम क्या है, बेटा?”
“मीनू।”
“किस क्लास में हो?”
“पाँचवीं में।”
“और… कब से इस गाड़ी में हो, मीनू?”
लड़की ने सिर ज़रा-सा टेढ़ा किया, जैसे सवाल समझ न आया हो। फिर बोली, “आज तो बहुत बारिश थी न अंकल जी। स्कूल से निकली तो इतना पानी था। मम्मी ने कहा था छाता मत भूलना।” उसने छाते को और कसकर पकड़ लिया। “मैं नहीं भूली।”
देवीदत्त का गला सूख गया।
* * *
पीछे की सीट पर अख़बार वाला आदमी अब भी सो रहा था। देवीदत्त उठा, गलियारे में लड़खड़ाता हुआ उसके पास गया, और उसका कंधा हिलाया।
“भाई साहब। भाई साहब, उठिए।”
अख़बार फिसलकर गिर पड़ा। नीचे कोई नहीं था। सीट पर बस एक गड्ढा था, जैसे कोई अभी-अभी उठा हो, और उसमें हल्की-सी गर्मी।
अख़बार ज़मीन पर खुला पड़ा था। पीला, भुरभुरा। देवीदत्त ने तारीख़ नहीं पढ़ी। उसने जान-बूझकर नहीं पढ़ी। मास्टर होने का यह फ़ायदा है कि आदमी जानता है, कुछ पन्ने बच्चों के सामने नहीं खोले जाते, और कुछ अपने सामने भी नहीं।
वह लौटकर अपनी सीट पर बैठा। डिब्बे में अब बस वे दोनों थे — वह और मीनू, और उसका टपकता हुआ छाता।
गाड़ी फिर चल पड़ी। आगे, अँधेरे में, अगली सुरंग का मुँह खुला था।
देवीदत्त को अचानक, बहुत साफ़ तरीक़े से, यह बात समझ आई कि अगर वह इस सुरंग में गया तो वह भी अख़बार वाले आदमी की तरह सीट पर एक गर्म गड्ढा बनकर रह जाएगा। और मीनू किसी अगले मुसाफ़िर से, उतने ही सलीक़े से, पूछेगी — अंकल जी, अगला स्टेशन कौन-सा है?
“मीनू,” उसने कहा, और उसकी आवाज़ में वह कड़क आ गई जो कक्षा में शोर रोकने के लिए आती थी। “बेटा, ज़रा छाता पकड़ाओ। तुम्हारे जूते का फ़ीता खुला है।”
यह सच था। उसके बाएँ जूते का फ़ीता खुला था। देवीदत्त ने पहले भी देखा था, और यह भी देखा था कि वह हर बार उसे बाँधने के लिए झुकती थी और हर बार गाड़ी चल पड़ती थी।
लड़की ने छाता उसकी ओर बढ़ाया। ठंडा, भारी, गीला। देवीदत्त ने उसे पकड़ा, और जैसे ही मीनू जूते पर झुकी, वह उठा, दो क़दम में दरवाज़े तक पहुँचा, और चलती गाड़ी से प्लैटफ़ॉर्म पर कूद गया।
घुटने में चोट लगी। हथेलियाँ बजरी पर छिल गईं। पीछे गाड़ी सुरंग में घुसी, और उसकी आवाज़ पहाड़ के भीतर गुम हो गई — इतनी जल्दी, इतनी पूरी तरह, जैसे वहाँ कभी कोई गाड़ी थी ही नहीं।
* * *
“अरे! अरे बाबू जी, क्या कर रहे हो?”
एक खलासी दौड़ता हुआ आया, हाथ में टॉर्च। पीछे स्टेशन की इमारत — पत्थर की, लाल छत वाली, उजली ट्यूबलाइटें, चाय की दुकान, एक कुत्ता। तख़्ती पर बड़े अक्षरों में: सोलन।
“कौन-सी गाड़ी से कूदे?” खलासी ने उसे बाँह से उठाया।
“अभी… अभी जो गई। कालका वाली।”
खलासी ने उसे अजीब नज़रों से देखा। “कालका वाली तो पौना घंटा पहले निकल गई, बाबू जी। उसके बाद कोई गाड़ी नहीं गई।”
देवीदत्त कुछ नहीं बोला। उसने अपने हाथ देखे। छिली हुई हथेलियाँ। और दाएँ हाथ में, कसकर पकड़ा हुआ, एक काला छाता, जिसकी लकड़ी की मूठ पर किसी बच्चे ने परकार की नोक से खुरचकर लिखा था: मीनू, कक्षा 5।
छाता गीला था। उसके सिरे से पानी टपक रहा था — टप, टप — सोलन के सूखे, ठंडे प्लैटफ़ॉर्म पर, साफ़ तारों वाले आसमान के नीचे।
* * *
उस रात उसने छाते को अपने किराए के कमरे के बाहर, बरामदे की खूँटी पर टाँग दिया। उसे भीतर लाने की हिम्मत नहीं हुई, और फेंकने की भी नहीं।
सुबह उसने दरवाज़ा खोला तो खूँटी के नीचे फ़र्श पर पानी का एक छोटा-सा गोल तालाब था, और छाता अब भी टपक रहा था।
उसने अपनी कलाई देखी। घड़ी चल रही थी।
पर देवीदत्त ने ग़ौर किया — बहुत देर बाद, चाय का पहला घूँट लेते हुए — कि सुबह से वह मन ही मन कुछ गुनगुना रहा था, एक बेमतलब-सी धुन, जैसे बच्चे रटते हैं, और उसके बोल थे: अगला स्टेशन कौन-सा है, अगला स्टेशन कौन-सा है।
Hindi · हिन्दी
Related stories
अँगूठा भी लगा दिया हैHindi Short StorySanchali Dahiya · संचाली दहिया
दो बजकर चौदह मिनटHindi Short StorySanchali Dahiya · संचाली दहिया
एक अध्याय रोज़Hindi Short StoryMahendra Pal Rattan · महेंद्र पाल रत्तन
घसियारी गाँठHindi Short StoryNilanjana Thapliyal · नीलांजना थपलियाल
बैलों के नामHindi Short StoryAnirudh Kalhans · अनिरुद्ध कलहंस
अपना खाताHindi Short StoryKavyanjali Mehrotra · काव्यांजलि मेहरोत्रा





