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The Poetic Land

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⏳ 12 मिनट • 🗣️ Hindi

दो बजकर चौदह मिनट

By Sanchali Dahiya · संचाली दहिया

कहानी “दो बजकर चौदह मिनट” का चित्र

THE HOOK: नोएडा की एक ऊँची सोसाइटी में रोज़ रात 2:14 पर शॉल ओढ़े एक औरत टावर सी की लिफ़्ट में घुसती है — और किसी मंज़िल पर नहीं उतरती। व्हाट्सऐप ग्रुप को भूत मिल गया है, नए फ़ौजी सुपरवाइज़र को एक सवाल।

रात दो बजकर चौदह मिनट पर टावर सी की लिफ़्ट नंबर दो में एक औरत घुसती है।

राजबीर सांगवान ने यह पहली बार अपनी तीसरी रात को देखा। अरावली हाइट्स के सिक्योरिटी केबिन में सोलह स्क्रीनें थीं, चार कतारों में, और उनकी नीली रोशनी में चाय का स्टील का गिलास भी किसी अस्पताल का औज़ार लगता था। बाहर नोएडा एक्सप्रेसवे पर ट्रक ऐसे गुज़रते थे जैसे कोई बहुत दूर बादल गरज रहा हो।

स्क्रीन नंबर ग्यारह पर औरत थी। हल्के रंग की शॉल, सिर तक ओढ़ी हुई, चेहरा नीचे। वह लॉबी से चलकर आती, लिफ़्ट के खुले दरवाज़े में कदम रखती, दरवाज़ा बंद होता। बस।

राजबीर ने घड़ी देखी। फिर रजिस्टर खोला और लिखा: “02:14 — टावर सी, लिफ़्ट 2, एक महिला, शॉल। 02:20 — किसी फ़्लोर पर नहीं उतरी (फ़्लोर लॉबी कैमरे जाँचे)।”

सत्रह साल फ़ौज में रहकर आदमी को एक ही बात समझ आती है: जो दिख रहा है वह लिखो, जो सोच रहे हो वह मत लिखो।

* * *

चौथी रात भी वही। पाँचवीं रात भी।

“भाई जी, या कोए ज़िंदा लुगाई कोन्या,” बबलू ने कहा। बबलू बीस साल का था, झज्जर का, रात की शिफ़्ट में मेन गेट पर रहता था और ख़ाली वक़्त में रील्स देखता था। “पूरी सोसाइटी में बात फैल री सै। ग्रुप में देखो।”

उसने फ़ोन आगे किया। “अरावली हाइट्स रेज़िडेंट्स (ऑफ़िशियल)” नाम के व्हाट्सऐप ग्रुप में चार सौ तेरह सदस्य थे, और उस रात साढ़े ग्यारह बजे किसी ने वही क्लिप डाल दी थी — स्क्रीन से मोबाइल पर रिकॉर्ड की हुई, टेढ़ी, धुँधली। नीचे दो सौ के क़रीब मैसेज।

“यह टावर सी की वही औरत है जो कंस्ट्रक्शन के टाइम ऊपर से गिरी थी। मेरी मेड बोल रही थी।”

“प्लीज़ बच्चों के सामने ऐसी चीज़ें मत डालिए।”

“सिक्योरिटी क्या कर रही है??? हम मेंटेनेंस किस बात का देते हैं?”

“मेरी कामवाली ने कल से काम छोड़ दिया, कहती है लिफ़्ट में ठंडक लगती है।”

“यह तो डीवीआर का ग्लिच है, पुराना सिस्टम है। एफ़एम साहब को बोलिए नया लगवाएँ।”

राजबीर ने फ़ोन लौटा दिया। “या क्लिप ग्रुप में किसने डाली?”

बबलू ने आँखें चुराईं। “बेरा ना, भाई जी।”

राजबीर ने उसे देर तक देखा, जैसे फ़ौज में किसी जवान को देखते थे जिसके जूते पॉलिश तो थे पर फीते ग़लत बँधे थे। फिर कहा, “आगे से केबिन की स्क्रीन का वीडियो किसी के फ़ोन में नहीं जाएगा। समझा?”

“समझ ग्या।”

* * *

अगली सुबह फ़ैसिलिटी मैनेजर विनीत भल्ला ख़ुद केबिन में आया। चालीस के आसपास, साफ़-सुथरा, कड़क प्रेस की हुई कमीज़, गले में एजेंसी का कार्ड, और दाएँ पैर में हल्की-सी लँगड़ाहट, जिसके बारे में उसने पहले ही दिन बता दिया था — “बाइक एक्सीडेंट, कॉलेज में। मौसम बदले तो बोलता है।”

“राजबीर जी, यह भूत-प्रेत वाला ड्रामा बंद करवाना पड़ेगा,” उसने मुस्कुराकर कहा। “आरडब्ल्यूए सेक्रेटरी का तीन बार फ़ोन आ चुका है। देखिए, सीधी बात है, डीवीआर सात साल पुराना है। फ़ुटेज में लूप आ जाता है, टाइमस्टैम्प गड़बड़ होता है। मैंने नए सिस्टम का कोटेशन भेज दिया है, इस हफ़्ते लग जाएगा। तब तक आप ग्यारह नंबर स्क्रीन बंद रखिए, गार्ड डरते हैं।”

“बंद रखूँ?”

“मतलब उसको मत देखिए। रिकॉर्डिंग चलती रहेगी।” भल्ला ने राजबीर के कंधे पर हाथ रखा। “आप फ़ौजी आदमी हैं, आप समझते हैं, लोग डर जाते हैं तो पैनिक फैलता है। बस।”

वह चला गया। राजबीर ने रजिस्टर में लिखा: “09:40 — एफ़एम विनीत भल्ला: डीवीआर बदलने की बात। स्क्रीन 11 बंद रखने को कहा।”

उसने स्क्रीन बंद नहीं की।

* * *

उस रात ढाई बजे केबिन का दरवाज़ा खटका। एक औरत खड़ी थी — ट्रैक पैंट, ऊनी टोपी, हाथ में थर्मस।

“सॉरी, मैं टावर सी, चौदह सौ चार से। नेहा कादियान।” उसकी आवाज़ में वह थकान थी जो एक रात की नहीं होती। “मुझे नींद नहीं आती। कई महीनों से। मैं अक्सर नीचे पार्क में चक्कर लगाती हूँ। ग्रुप में आपकी वो क्लिप देखी… क्या मैं ओरिजिनल देख सकती हूँ? मुझे कुछ अजीब लगा।”

राजबीर ने उसका आईडी कार्ड नहीं माँगा; उसके गेट-पास का नंबर उसे याद था, पहले हफ़्ते में ही सबके याद कर लिए थे। उसने कुर्सी आगे की।

उन्होंने चार रातों की फ़ुटेज साथ-साथ चलाई। दो बजकर चौदह मिनट शून्य सेकंड। औरत आती है। तेरह कदम। लिफ़्ट। दरवाज़ा।

“रोकिए,” नेहा ने कहा। “पीछे दीवार पर नोटिस बोर्ड देखिए।”

राजबीर ने ज़ूम किया। धुँधले सफ़ेद काग़ज़ पर मोटे अक्षर किसी तरह पढ़े जा सकते थे — “पानी की सप्लाई 12 अक्टूबर को सुबह 10 से 4 बंद रहेगी।”

“वह नोटिस बीस अक्टूबर को हट गया था,” नेहा ने कहा। “मुझे पता है, क्योंकि उसकी जगह मैंने योगा कैंप का पोस्टर लगाया था। मैं कमेटी में हूँ।”

राजबीर ने कल रात की फ़ुटेज चलाई, औरत के आने से दस मिनट पहले की, 02:04 की। पीछे बोर्ड पर योगा कैंप का पोस्टर था। फिर 02:14 पर — पानी वाला नोटिस। फिर 02:16 पर फिर से योगा कैंप।

दोनों ने एक-दूसरे को देखा।

“यह भूत नहीं है,” राजबीर ने धीरे से कहा। “यह चिपकाया हुआ है।”

* * *

फ़ौज में पोस्टिंग पर पहला सबक़ था — दुश्मन जहाँ ध्यान खींचना चाहता है, वहाँ मत देखो। देखो कि उस वक़्त बाक़ी जगह क्या हो रहा है।

राजबीर ने फ़ुटेज को सेकंड-सेकंड चलाया। 02:13:58 पर टावर सी की लिफ़्ट वाला फ़ीड एक पल को झिलमिलाता है, और 02:28:40 पर फिर। बीच के चौदह मिनट और कुछ सेकंड — वही औरत, फिर ख़ाली लिफ़्ट लॉबी, एक जैसा सन्नाटा। उसने 02:20 का फ़्रेम और 02:26 का फ़्रेम साथ रखे। लॉबी के कोने में एक पतंगा दीवार पर बैठा था। दोनों फ़्रेमों में वह बिल्कुल एक जगह था, पंख भी उसी कोण पर।

“कोई इन चौदह मिनट में इस कैमरे पर पुरानी रिकॉर्डिंग चला रहा है,” नेहा ने कहा। “लूप।”

“और जो इसे लगा सकता है, उसके पास डीवीआर का एडमिन पासवर्ड है।” राजबीर ने स्क्रीन के कोने में लॉग-इन मेन्यू खोला। ऑपरेटर अकाउंट से वह सिर्फ़ देख सकता था। एडमिन — एजेंसी के पास था। यानी भल्ला के पास।

“पर वह चौदह मिनट में करता क्या है?” नेहा ने पूछा।

राजबीर उठा, खिड़की से बाहर टावर सी को देखा। बाईस मंज़िलें, आधी खिड़कियाँ अँधेरी। “लिफ़्ट दो के पीछे सर्विस लिफ़्ट है। उसका कैमरा सितंबर से ख़राब है। कंप्लेंट पेंडिंग है। एफ़एम ऑफ़िस में।”

* * *

अगले दिन, दोपहर में, राजबीर बिना वर्दी के मशीन रूम गया, टावर सी की छत पर। लिफ़्ट कंपनी का टेक्नीशियन मुकेश वहाँ अक्सर बैठता था, पर उस दिन छुट्टी पर था। कंट्रोल पैनल पर एक छोटी-सी स्क्रीन थी जिसमें हर लिफ़्ट की हर हरकत दर्ज होती है — कौन-सी मंज़िल, किस वक़्त, किसने बटन दबाया, अंदर से या बाहर से। यह बात राजबीर को फ़ौज ने नहीं, उसके चाचा के लड़के ने सिखाई थी, जो गुड़गाँव में लिफ़्टें लगाता था।

पिछले तीस दिन। लिफ़्ट दो, रात 02:14 — कोई हरकत नहीं। सिर्फ़ एक रात को छोड़कर: 12 अक्टूबर, 02:14, ग्राउंड से अठारहवीं मंज़िल, फिर वापस ग्राउंड। उसके बाद कभी नहीं। कोई नहीं चढ़ा था उसमें। कोई चढ़ता तो वह कहीं तो जाती।

सर्विस लिफ़्ट — पिछले तीस दिन में नौ रातें। हर बार 02:15 से 02:28 के बीच। बेसमेंट दो से नौवीं मंज़िल। फिर ग्यारहवीं। फिर सोलहवीं। फिर वापस बेसमेंट दो।

उसने फ़ोन में फ़ोटो खींची। फिर उसी शाम नेहा को मैसेज किया — “902, 1103, 1602। मालिक कौन?”

दस मिनट में जवाब आया। नेहा ने सोसाइटी ऐप की डायरेक्टरी से निकाला था।

“902 — दुबई। 1103 — टोरंटो, पिछले साल से। 1602 — मेलबर्न, बेटे के पास। तीनों फ़्लैट लॉक्ड। और सुनिए — तीनों की चाबी एफ़एम ऑफ़िस में जमा है। एनआरआई ओनर्स के लिए ‘की डिपॉज़िट सर्विस’ है, सीपेज या लीकेज चेक के लिए। मेरी पड़ोसन ने भी दे रखी है।”

दो मिनट बाद एक और मैसेज: “मैंने 1103 वाले अंकल को फ़ेसबुक पर ढूँढ़ा। उनकी पत्नी की एक पोस्ट है, जुलाई की, घर की फ़ोटो — दीवार पर एक पुरानी पेंटिंग, कोने में पीतल का बड़ा लैंप। मैं कल किसी बहाने उनके दरवाज़े तक गई थी, लेटरबॉक्स की झिरी से अंदर झाँका। वह दीवार ख़ाली है।”

राजबीर ने फ़ोन नीचे रखा। बाहर बबलू किसी डिलीवरी वाले से हरियाणवी में बहस कर रहा था। उसने रजिस्टर में कुछ नहीं लिखा। कुछ चीज़ें तब तक नहीं लिखी जातीं जब तक पक्की न हों।

* * *

अगली रात उसने अपनी ड्यूटी का चार्ट वैसा ही रखा। 01:30 का राउंड, 02:00 पर केबिन में वापसी, रजिस्टर में दस्तख़त। बबलू को उसने गेट पर रहने दिया और कुछ नहीं बताया। फिर 02:05 पर कहा, “पेट ख़राब सै, दस मिनट में आया,” और केबिन के पीछे वाले दरवाज़े से निकलकर बेसमेंट की रैंप से नीचे उतर गया।

बेसमेंट दो में हवा भारी थी, डीज़ल और सीलन की। ट्यूबलाइटें हर तीसरी ख़राब। वह एक खंभे के पीछे, सर्विस लिफ़्ट से तीस गज़ दूर, गाड़ियों की कतार के बीच बैठ गया। फ़ोन रिकॉर्डिंग पर, स्क्रीन की रोशनी हथेली से ढकी।

02:13 पर रैंप से एक सफ़ेद टेम्पो उतरा, बत्तियाँ बंद। पीछे लिखा था “फ़्रेश बास्केट — होम डिलीवरी”। राजबीर ने नंबर प्लेट पढ़ी और मन में दो बार दोहराई।

02:15 पर सर्विस लिफ़्ट नीचे आई। दरवाज़ा खुला। अंदर मुकेश था, लिफ़्ट वाला टेक्नीशियन, जो “छुट्टी पर” था। उसके साथ दो लड़के जिन्हें राजबीर ने कभी नहीं देखा था। उनके हाथों में कंबल में लिपटी कोई लंबी चीज़ थी — शायद लैंप, शायद पेंटिंग — और दो गत्ते के डिब्बे जिन पर “किचन आइटम्स” लिखा था।

और टेम्पो के ड्राइवर वाले दरवाज़े से एक आदमी उतरा, जिसने दाएँ पैर पर ज़रा कम वज़न डाला।

राजबीर का दिल नहीं धड़का, उसकी साँस धीमी हुई। फ़ौज में ऐसा ही होता था। जो डरते हैं उनकी साँस तेज़ होती है, जिन्होंने देखा है उनकी धीमी।

उसने सामने आकर ललकारा नहीं। एक आदमी तीन-चार के सामने, बेसमेंट में, बिना हथियार — यह बहादुरी नहीं, बेवक़ूफ़ी होती। उसने रिकॉर्डिंग चालू रखी, खंभे के पीछे से रेंगकर रैंप के पास पहुँचा, और 112 पर फ़ोन किया। धीमी आवाज़, साफ़ शब्द: सोसाइटी का नाम, सेक्टर, बेसमेंट दो, सफ़ेद टेम्पो, नंबर, चार लोग, कोई हथियार नहीं दिखा। फिर गेट पर बबलू को फ़ोन किया।

“बबलू। सुण। एक सफ़ेद टेम्पो निकलेगा, फ़्रेश बास्केट वाला। बूम बैरियर नहीं उठाणा। किसी भी हालत में नहीं। कोई भी बोले, एफ़एम साहब बोलें, तो भी नहीं। कह दियो सिस्टम ख़राब सै।”

दूसरी तरफ़ एक पल सन्नाटा रहा। फिर बबलू की आवाज़ आई, पहली बार बिना डर के, “ठीक सै, भाई जी।”

* * *

पुलिस की जीप सात मिनट में आई। तब तक टेम्पो गेट पर खड़ा था, बूम बैरियर नीचे, और विनीत भल्ला खिड़की से झुककर बबलू पर चिल्ला रहा था कि वह उसकी नौकरी खा जाएगा। बबलू ने दोनों हाथ पीछे बाँध रखे थे, बिल्कुल वैसे जैसे राजबीर खड़ा होता है, और बार-बार एक ही बात दोहरा रहा था, “सर, सिस्टम ख़राब सै।”

टेम्पो में से 1103 का पीतल का लैंप निकला, 902 से दो एसी के आउटडोर यूनिट, 1602 से एक लॉकर जिसका ताला कटा हुआ था। एफ़एम ऑफ़िस की दराज़ में चाबियों के गुच्छों के साथ एक डायरी मिली, जिसमें तीन और सोसाइटियों के फ़्लैट नंबर थे, सबके आगे देश के नाम लिखे — कनाडा, दुबई, यूके।

सुबह चार बजे, जब पुलिस वाले काग़ज़ भर रहे थे, नेहा केबिन में आई। “एक बात समझ नहीं आई,” उसने कहा। “वो शॉल वाली औरत। लूप में वो कौन थी? वो रिकॉर्डिंग कहाँ से आई?”

राजबीर ने 12 अक्टूबर की असली फ़ुटेज निकाली। उस दिन पानी नहीं था, सोसाइटी में आधी रात तक लोग इधर-उधर थे। 02:14 पर टावर सी की लॉबी में एक आकृति, शॉल में, सिर ढका, लिफ़्ट में घुसती है। और लिफ़्ट के अंदर वाले कैमरे में — जो उस रात ठीक चल रहा था — वह आकृति शॉल उतारती है, बालों पर हाथ फेरती है, और कैमरे की तरफ़ देखकर मुस्कुराती है।

विनीत भल्ला।

“रिहर्सल,” राजबीर ने कहा। “ख़ुद बना के देखा कि कैसा दिखेगा। फिर लिफ़्ट के अंदर वाला हिस्सा काट दिया, लॉबी वाला रख लिया। भूत का डर फैलेगा तो रात को कोई लॉबी में नहीं आएगा, गार्ड स्क्रीन नहीं देखेंगे, और सोसाइटी ख़ुद उससे कहेगी कि पुराना डीवीआर बदल दो। सारी रिकॉर्डिंग के साथ।”

“आपको कैसे पता चला कि वह है?”

राजबीर ने स्क्रीन पर फ़ुटेज फिर चलाई, लॉबी वाली, वही तेरह कदम। “चाल,” उसने कहा। “दायाँ पैर। मौसम बदले तो बोलता है।”

नेहा देर तक स्क्रीन देखती रही। फिर हँसी, थकी हुई, सच्ची हँसी। “और ग्रुप में क्लिप किसने डाली थी?”

राजबीर ने गेट की ओर देखा, जहाँ बबलू एक पुलिस वाले को चाय पकड़ा रहा था।

“भल्ला ने उसको सौ रुपये दिए थे,” उसने कहा। “कल रात बताया। रोते-रोते।”

* * *

अगली रात दो बजकर चौदह मिनट पर राजबीर ने स्क्रीन नंबर ग्यारह देखी। टावर सी, लिफ़्ट दो, ख़ाली। पीछे बोर्ड पर योगा कैंप का पोस्टर। कोने में कोई पतंगा नहीं।

उसने रजिस्टर में लिखा: “02:14 — टावर सी, लिफ़्ट 2: ख़ाली। सब ठीक।”

फिर, एक पल रुककर, नीचे जोड़ा: “टावर सी, 1404 की बत्ती बंद।”

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About the Author

Sanchali Dahiya (b. 1987) grew up in Rohtak and works as an HR manager in Noida. She writes crime and suspense set in gated societies, offices and the ring roads that join them.

संचाली दहिया (जन्म 1987) रोहतक में पली-बढ़ीं और नोएडा में एचआर मैनेजर हैं। वे गेटेड सोसाइटियों, दफ़्तरों और उन्हें जोड़ने वाली सड़कों पर घटने वाली अपराध और रहस्य-कथाएँ लिखती हैं।

📍 Noida, India

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