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The Poetic Land

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⏳ 9 मिनट • 🗣️ Hindi

गड्ढा श्री का जन्मोत्सव

By Rohitashva Bhanot · रोहिताश्व भनोट

कहानी “गड्ढा श्री का जन्मोत्सव” का चित्र

THE HOOK: कानपुर की एक सड़क पर एक गड्ढा पैदा हुआ। साल भर में उसे एक समिति मिली, एक नामपट्ट, एक सेल्फ़ी पॉइंट, एक चाय का ठेला और एक जन्मदिन — और फिर एक दिन नगर निगम आ गया।

मैं प्रेस चलाता हूँ। फूलबाग़ के पीछे, ‘भनोट प्रिंटर्स’, जहाँ शादी के कार्ड, स्कूल की डायरियाँ और कभी-कभी किसी रिटायर्ड दरोग़ा जी का कविता-संग्रह छपता है। कविता-संग्रह की सौ प्रतियाँ छपती हैं, अट्ठानबे दरोग़ा जी के ड्रॉइंग रूम में रहती हैं, एक मुझे मिलती है, एक उनकी पत्नी तकिये के नीचे रखती हैं। मैं ये इसलिए बता रहा हूँ कि आप समझ लें, मुझे किसी बात पर आश्चर्य नहीं होता। मेरा पेशा आश्चर्य छापना है, महसूस करना नहीं।

फिर भी गड्ढे वाली बात थोड़ी अलग थी।

* * *

गड्ढा पिछले साल अगस्त में पैदा हुआ। तारीख़ मुझे इसलिए याद है कि उसी दिन मेरी प्रेस की बड़ी मशीन, जिसे स्टाफ़ प्यार से ‘बुढ़िया’ कहता है, तीसरी बार बैठ गई थी, और मैं मिस्त्री को बुलाने उसी सड़क से गया था। सुबह सड़क पर बस एक हल्की-सी दरार थी, जैसे किसी सरकारी फ़ाइल पर पहला दस्तख़त। शाम तक बारिश हुई, और लौटते वक़्त वहाँ एक साफ़-सुथरा, गोल, क़रीब छह फ़ुट चौड़ा गड्ढा था, जिसमें पानी ऐसे भरा था जैसे कोई छोटा-सा निजी तालाब।

पहले हफ़्ते मोहल्ले ने वही किया जो हर ज़िम्मेदार मोहल्ला करता है। शिकायत की। वर्मा जी, जो रिटायर्ड हैं और जिनके पास शिकायत करने के अलावा कोई शौक़ नहीं बचा, उन्होंने नगर निगम को ऑनलाइन, ऑफ़लाइन, और एक बार तो सपने में भी शिकायत दर्ज करवाई। सपने वाली शिकायत का नंबर उन्हें याद नहीं रहा, बाक़ी दोनों का था।

जवाब आया कि शिकायत ‘संबंधित विभाग को अग्रसारित’ कर दी गई है। संबंधित विभाग ने उसे ‘क्षेत्रीय अभियंता’ को अग्रसारित किया। क्षेत्रीय अभियंता ने लिखा कि सड़क उनके क्षेत्र में नहीं, जल-निकासी विभाग के क्षेत्र में है, क्योंकि गड्ढे में पानी है। जल-निकासी विभाग ने लिखा कि पानी तो बारिश का है, बारिश उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। मैंने वर्मा जी से कहा कि अब बस इंद्र देवता को अग्रसारित होना बाक़ी है। वर्मा जी नाराज़ हो गए। रिटायर्ड लोग व्यंग्य को निजी हमला समझते हैं, क्योंकि उनके पास उसे समझने का पूरा समय होता है।

* * *

दूसरे महीने एक ‘अध्ययन समिति’ बनी। मैं ये इसलिए जानता हूँ कि समिति के लेटरहेड मेरी प्रेस में छपे। पाँच सौ प्रतियाँ, ऊपर ‘गड्ढा निवारण एवं सड़क पुनर्स्थापन अध्ययन समिति, वार्ड क्रमांक —’ और नीचे सात सदस्यों के नाम। समिति के अध्यक्ष थे पार्षद जी के साले, उपाध्यक्ष पार्षद जी के साले के समधी, और सचिव वो लड़का जो पार्षद जी के घर पर चाय लाता था और जिसे अचानक लगा कि उसका भविष्य जनसेवा में है।

समिति ने तीन बैठकें कीं। तीनों गड्ढे के किनारे हुईं, क्योंकि अध्यक्ष जी का मानना था कि ‘समस्या की आँखों में आँखें डालकर’ बात होनी चाहिए। पहली बैठक में तय हुआ कि गड्ढे की नाप ली जाए। दूसरी बैठक में नाप पर आपत्ति हुई, क्योंकि उपाध्यक्ष जी ने फ़ीते से नापा था और सचिव ने क़दमों से, और दोनों के आँकड़ों में चार फ़ुट का फ़र्क़ था। तीसरी बैठक में तय हुआ कि जब तक समिति अपनी रिपोर्ट नहीं दे देती, गड्ढे की ‘पहचान’ सुरक्षित रखी जाए, ताकि कोई और विभाग आकर उसे अपना न बता दे।

पहचान सुरक्षित रखने के लिए एक नामपट्ट लगा। वो भी मेरी प्रेस से गया, फ़्लेक्स पर, पीली पट्टी के साथ: ‘यह गड्ढा अध्ययनाधीन है। — अध्ययन समिति।’

अब आप सोचिए। एक आदमी रोज़ सुबह उस सड़क से गुज़रता है, और देखता है कि एक साधारण-सा गड्ढा अब ‘अध्ययनाधीन’ है। उसके मन में गड्ढे के प्रति सम्मान जागता है। जो चीज़ अध्ययनाधीन है, उसमें ज़रूर कुछ बात होगी। लोग रुककर देखने लगे। एक-दो ने हाथ जोड़े। एक औरत ने उसमें फूल डाल दिए। मोहल्ले ने अपनी आस्था कभी किसी डिग्री के भरोसे नहीं रखी।

* * *

तीसरे महीने ‘कनपुरिया कैमरा’ आया। ये एक यूट्यूबर है, पूरा नाम मुझे नहीं पता, बस इतना कि वह अपनी हर वीडियो ‘का हाल है कानपुर!’ चीख़कर शुरू करता है और ‘बेहद भौकाल’ पर ख़त्म करता है। उसने गड्ढे पर एक वीडियो बनाया: ‘कानपुर का सबसे बड़ा रहस्य — इस गड्ढे में क्या है?’ वीडियो में उसने गड्ढे के पानी में एक सिक्का डाला, फिर कैमरे की तरफ़ देखकर कहा, “भाई लोग, सिक्का लौटकर नहीं आया।” सिक्का लौटकर कैसे आता, ये किसी ने नहीं पूछा। वीडियो पर तीन लाख व्यू आए।

उसके अगले हफ़्ते गड्ढे के किनारे एक चाय का ठेला लग गया। ठेले वाले का नाम पप्पू है, और उसने ठेले पर लिखवाया: ‘गड्ढा टी स्टॉल — जहाँ चाय और चर्चा दोनों गहरी’। ये लाइन उसने मुझसे लिखवाई थी, पैसे अब तक नहीं दिए। उसका कहना है कि लाइन से धंधा बढ़ा तो दे देगा, नहीं बढ़ा तो लाइन ही कमज़ोर थी। धंधा बढ़ा। पैसे नहीं आए। ये भी एक तरह का अध्ययन है।

फिर किसी ने गड्ढे के पास एक लोहे का फ़्रेम खड़ा कर दिया, दिल के आकार का, और उस पर लिखा ‘आई लव गड्ढा’। लोग उस फ़्रेम में खड़े होकर, पीछे गड्ढे को लेकर सेल्फ़ी लेने लगे। जोड़े आने लगे। एक बार एक प्री-वेडिंग शूट भी हुआ, जिसमें लड़की ने लाल लहँगा पहना था और लड़का गड्ढे के किनारे घुटने पर बैठा था। फ़ोटोग्राफ़र बार-बार चिल्ला रहा था, “भैया थोड़ा पीछे… नहीं, इतना नहीं, इतना पीछे नहीं!”

इस पूरे दौरान दो स्कूटर उस गड्ढे में गिरे, एक रिक्शा पलटा, और एक सब्ज़ी वाले के सारे टमाटर उसमें तैर गए। पर मोहल्ले ने इन घटनाओं को ‘गड्ढे की प्रसिद्धि का मूल्य’ मानकर स्वीकार कर लिया। बड़ी चीज़ों के साथ थोड़ा जोखिम तो रहता ही है।

* * *

अगस्त फिर आया, और साथ में गड्ढे का पहला जन्मदिन।

आयोजन समिति वही थी जो अध्ययन समिति थी, बस लेटरहेड नया छपा। मुझे बैनर का ऑर्डर मिला। अध्यक्ष जी ख़ुद आए, प्रेस में बैठे, मेरी चाय पी, और बैनर का मज़मून लिखवाया।

“लिखिए — ‘हमारे अपने गड्ढा श्री का प्रथम जन्मोत्सव’।”

“श्री?” मैंने पूछा।

“और क्या। एक साल से मोहल्ले की सेवा कर रहे हैं। श्री तो बनता है।”

मैंने लिखा। फिर उन्होंने नीचे सात सदस्यों के नाम लिखवाए, फिर पार्षद जी की फ़ोटो लगवाई, फिर पार्षद जी के साले की, फिर साले के समधी की, और जब सचिव की फ़ोटो की बारी आई तो बैनर पर गड्ढे के लिए जगह ही नहीं बची। अध्यक्ष जी ने बैनर का प्रूफ़ देखा और कहा, “गड्ढा तो सबको पता ही है कहाँ है। फ़ोटो की क्या ज़रूरत।”

जन्मदिन धूमधाम से मना। गड्ढे के किनारे एक केक काटा गया, जिस पर चॉकलेट से एक गोल गड्ढा बनाया गया था। पप्पू ने उस दिन चाय पाँच रुपये महँगी कर दी, ‘विशेष अवसर’ के नाम पर। कनपुरिया कैमरा लाइव आया, और उसने गड्ढे के पानी में एक मोमबत्ती तैराई। बच्चों ने ‘हैप्पी बर्थडे टू यू’ गाया। एक बुज़ुर्ग ने भाषण दिया कि हमारे ज़माने में गड्ढे तो होते थे, पर उनकी ऐसी इज़्ज़त नहीं होती थी। ताली बजी।

मैं भी गया था। बैनर ठीक से टँगा है या नहीं, देखने। ठीक से टँगा था। हवा में थोड़ा झूल रहा था, और पार्षद जी की फ़ोटो ठीक गड्ढे के ऊपर ऐसे लटक रही थी जैसे कोई देवता किसी कुंड पर कृपा बरसा रहा हो।

* * *

जन्मदिन के ठीक नौ दिन बाद नगर निगम आया।

किसी को नहीं पता किसने बुलाया। वर्मा जी ने कसम खाई कि उनकी शिकायत तो पिछले साल ही बंद हो चुकी थी। विभाग वालों के पास एक आदेश था, जिस पर किसी नई योजना का नाम था, और एक रोड-रोलर था, जो पहली बार उस सड़क पर आया था और इसलिए बहुत सावधानी से चल रहा था, जैसे किसी अनजान मोहल्ले में बारात।

दो घंटे में गड्ढा भर दिया गया। गिट्टी, तारकोल, रोलर। सड़क समतल हो गई। बस इतना ही।

उस शाम मोहल्ले में ऐसा सन्नाटा था जैसा किसी के घर ग़मी में होता है। पप्पू अपने ठेले के पास खड़ा समतल सड़क को देख रहा था, और उसकी आँखों में वो भाव था जो किसी किसान की आँखों में होता है जब ओले पड़ जाएँ। ‘आई लव गड्ढा’ वाला फ़्रेम अब एक काली, सपाट, बेरहम सड़क के सामने अकेला खड़ा था, और उसमें सेल्फ़ी लेने वाला कोई नहीं था।

अगली सुबह विरोध प्रदर्शन हुआ।

मैं सच कह रहा हूँ। तख़्तियाँ थीं, नारे थे। ‘हमारा गड्ढा वापस करो।’ ‘विकास के नाम पर विरासत का विनाश बंद करो।’ ‘गड्ढा हमारी पहचान है।’ ये तख़्तियाँ भी मेरी प्रेस में छपीं, रात भर में, ओवरटाइम पर। मेरे स्टाफ़ के लड़के बब्बू ने छापते हुए पूछा, “भैया, ये लोग पागल हैं क्या?” मैंने कहा, “बेटा, ये लोग ग्राहक हैं। एडवांस दिया है।”

कनपुरिया कैमरा ने वीडियो बनाया: ‘कानपुर ने खो दिया अपना सबसे बड़ा लैंडमार्क — कौन है ज़िम्मेदार?’ इस वीडियो पर पाँच लाख व्यू आए। अध्ययन समिति ने एक ‘शोक प्रस्ताव’ पारित किया और नगर निगम को एक ज्ञापन सौंपा, जिसमें माँग की गई थी कि गड्ढे को उसके ‘मूल स्वरूप’ में पुनर्स्थापित किया जाए। ज्ञापन संबंधित विभाग को अग्रसारित कर दिया गया।

* * *

आज सुबह अध्यक्ष जी फिर प्रेस आए। उनके साथ सचिव भी था, जिसका भविष्य अब जनसेवा में पक्का हो चुका है, क्योंकि उसकी फ़ोटो दो बैनरों पर आ चुकी है।

“एक बैनर और छपना है,” अध्यक्ष जी ने कहा, “बड़ा वाला। बीस बाई दस।”

“क्या लिखना है?”

उन्होंने सचिव की तरफ़ देखा, सचिव ने अपने फ़ोन में कुछ देखा, फिर बोला, “‘नवीन गड्ढा शिलान्यास समारोह’। अगली गली में। निगम वालों से बात हो गई है, वो पानी की लाइन के लिए वहाँ खुदाई करेंगे, और फिर… छोड़ देंगे।”

“नाम क्या छापें? गड्ढे का?”

अध्यक्ष जी ने बड़ी गंभीरता से सिर हिलाया। “अभी तय नहीं हुआ। समिति बैठेगी। पहले गड्ढा तो हो जाए।”

मैंने एडवांस लिया, रसीद काटी, और बब्बू को फ़्लेक्स का रोल निकालने के लिए कहा। बुढ़िया मशीन ने एक लंबी साँस ली और चल पड़ी।

मुझे किसी बात पर आश्चर्य नहीं होता। मैंने पहले ही बता दिया था।

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About the Author

Rohitashva Bhanot (b. 1977) runs a small printing press near Phoolbagh in Kanpur, printing wedding cards, school diaries and the occasional poetry booklet. His satire comes from what customers ask him to print and what they ask him to leave out.

रोहिताश्व भनोट (जन्म 1977) कानपुर में फूलबाग़ के पास एक छोटी-सी प्रिंटिंग प्रेस चलाते हैं, जहाँ शादी के कार्ड, स्कूल की डायरियाँ और कभी-कभार कविता की पुस्तिकाएँ छपती हैं। उनका व्यंग्य वहीं से आता है जो ग्राहक छपवाना चाहते हैं और जो छुपवाना चाहते हैं।

📍 Kanpur, India

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