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⏳ 2 मिनट • 🗣️ Hindi

खिड़की वाली सीट

By Aaditya Shirsekar · आदित्य शिरसेकर

कहानी “खिड़की वाली सीट” का चित्र

THE HOOK: मुंबई की लोकल में खिड़की की सीट के लिए रोज़ जंग होती है। पर एक बुज़ुर्ग हर सुबह एक ख़ास स्टेशन पर अपनी जीती हुई सीट ख़ुद छोड़ देता है।

बोरीवली से चर्चगेट की सात बावन वाली स्लो लोकल में खिड़की की सीट जीतनी पड़ती है। ट्रेन प्लेटफ़ॉर्म में घुसती भी नहीं कि लोग चलती में कूदते हैं, बैग फेंककर जगह रोकते हैं, कोहनियाँ चलती हैं। मैं दो साल से ये लड़ाई लड़ रहा हूँ। आधे दिन हारता हूँ।

वो बुड्ढा कभी नहीं हारता।

सफ़ेद कुर्ता, भूरी चप्पल, हाथ में एक काली छतरी, बारिश हो या न हो। पता नहीं कहाँ से चढ़ता है, पर जब तक मैं अंदर पहुँचूँ, वो दाईं तरफ़ की खिड़की पर बैठा होता है, आँखें बंद, जैसे सीट उसके नाम लिखी हो।

और फिर बांद्रा आते ही वो उठ जाता है।

रोज़। बांद्रा पर। न उतरता है, न किसी को कुछ बोलता है। उठकर सामने वाले दरवाज़े पर चला जाता है, बाईं तरफ़, और डंडा पकड़कर बाहर देखता रहता है। माहिम की खाड़ी के बाद, पटरी के उस पार, एक पुरानी चार माले की बिल्डिंग है — पीला रंग उतरा हुआ, बालकनियों में ज़ंग खाई ग्रिल, छत पर पानी की टंकी। ‘हरिदास मेंशन’, आधा मिटा हुआ। वो उसे तब तक देखता है जब तक वो पीछे न छूट जाए। फिर अगले स्टेशन पर उतर जाता है।

उसकी छोड़ी हुई सीट पर मैं बैठता हूँ। बांद्रा से चर्चगेट। दो साल से। मैंने कभी पूछा नहीं। बम्बई में कोई किसी से पूछता नहीं। सीट मिल रही है, बस।

पिछले हफ़्ते बिल्डिंग पर हरा कपड़ा चढ़ गया। फिर एक दिन उसकी ऊपरी मंज़िल नहीं थी।

आज वहाँ कुछ नहीं है। मलबा, एक पीली जेसीबी, और धूल, जो सुबह की धूप में सोने जैसी उड़ रही है।

आज बांद्रा आता है और बुड्ढा नहीं उठता।

मैं इंतज़ार करता हूँ। ट्रेन चलती है। खाड़ी आती है। वो सीधा आगे देखता रहता है, छतरी घुटनों पर। ख़ाली प्लॉट निकल जाता है। उसने गर्दन तक नहीं मोड़ी।

“आज नहीं देखा, अंकल?”

वो मुझे देखता है, जैसे पहली बार देख रहा हो। फिर मुस्कुराता है।

“तीसरा माला, कोने वाली खिड़की। मेरी घरवाली वहाँ खड़ी रहती थी, रोज़ सुबह, इसी गाड़ी के टाइम पे। मैं रात की ड्यूटी से लौटता, वो हाथ हिलाती, मैं हाथ हिलाता। फिर माहिम उतरके घर। इकतीस साल।” वो छतरी की मूठ पर उँगली फेरता है। “नौ साल पहले चली गई। फिर भी मैं देखता था। खिड़की तो थी न।”

माहिम निकल जाता है। वो उतरता नहीं। चर्चगेट तक बैठा रहता है, आँखें बंद।

अगले दिन वो नहीं आया। उसके अगले दिन भी नहीं।

अब वो खिड़की मेरी है। किसी से लड़ना नहीं पड़ता।

फिर भी बांद्रा आता है, तो मैं उठ जाता हूँ।

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About the Author

Aaditya Shirsekar (b. 1998) lives in Kandivali and works night shifts at a customer support centre in Malad, Mumbai. He writes in Hindi and Marathi about the city between midnight and the first local train.

आदित्य शिरसेकर (जन्म 1998) मुंबई के कांदिवली में रहते हैं और मालाड के एक कस्टमर सपोर्ट सेंटर में रात की पाली में काम करते हैं। वे हिंदी और मराठी में आधी रात से पहली लोकल तक के शहर के बारे में लिखते हैं।

📍 Mumbai, India

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