मेहँदी के बारे में सबसे पहली बात जो नानी ने मुझे सिखाई थी, वह यह नहीं थी कि पत्ते कब तोड़ने हैं या पिसी हुई मेहँदी में कितना नींबू, कितनी चीनी, कितना लौंग का तेल डालना है। सबसे पहली बात थी: “ज़बान बंद।”
मैं नौ बरस की थी। दरगाह बाज़ार की उस गली में, जहाँ ऊपर की मंज़िलों के छज्जे आपस में इतने क़रीब हैं कि सामने वाली ख़ाला से नमक माँगा जा सकता है, नानी की छोटी-सी दुकान थी — ‘हिना हाउस’, जिसका बोर्ड लकड़ी का था और जिसकी ‘ह’ बरसात में बह गई थी, तो बरसों तक लोग उसे ‘इना हाउस’ ही कहते रहे। नानी उस दिन एक दुल्हन के हाथ पर बेल बना रही थीं, और मैं पास बैठी कोन में मेहँदी भर रही थी। मेहँदी सूखी, और मैंने देखा कि दुल्हन की हथेली पर बनी बेल धीरे-धीरे सरक रही है, जैसे पानी में तिनका। पत्ते आपस में जुड़ रहे थे, एक मोर अपनी गर्दन मोड़कर एक छोटे-से दरवाज़े में बदल रहा था, और कलाई के पास तीन बिंदियाँ एक-दूसरे का हाथ पकड़कर चलने लगी थीं।
मैंने मुँह खोला। नानी ने मेरी कलाई पर अपनी मेहँदी लगी उँगली रखी — हल्के से, पर इतनी ठंडी कि मैं चुप हो गई — और कहा, “ज़बान बंद।”
बाद में, जब दुल्हन चली गई, नानी ने समझाया। यह हमारे ख़ानदान की औरतों को मिलता है, हर पीढ़ी में एक को। जब दुल्हन की मेहँदी सूखती है, तो उसकी हथेली का नक़्शा अपनी शक्ल बदलकर उसकी आने वाली ज़िंदगी का नक़्शा बन जाता है। बस मेहँदी लगाने वाली उसे पढ़ सकती है। और वह कभी, किसी को, कुछ नहीं बताती।
“क्यों, नानी?”
“क्योंकि जो बात बता दी, वह बदल जाती है,” नानी ने कहा, और अपनी चाँदी की डिबिया से एक चुटकी ज़र्दा मुँह में डाला। “और जो बात बदल गई, उसका गुनाह हमारे सिर।”
* * *
नानी को गए अब ग्यारह बरस हो गए। दुकान अब मेरी है। ‘ह’ मैंने फिर से लिखवा दी है, और साथ में दर्ज़ीगीरी भी शुरू कर दी है, क्योंकि आजकल लोग मेहँदी के साथ ब्लाउज़ भी सिलवाना चाहते हैं, और एक ही दुकान पर दोनों काम हो जाएँ तो दुल्हनों की अम्मियों को सुकून रहता है। मेरी उम्र चौंतीस है, और मैंने इन बरसों में कोई सात सौ दुल्हनों की हथेलियाँ पढ़ी होंगी।
मैंने उनमें बच्चे देखे हैं — छोटे-छोटे कैरी के बूटे, जो सूखते-सूखते गोल चेहरे बन जाते हैं। घर देखे हैं, कभी एक कमरे के, कभी तीन मंज़िला, कभी किसी और मुल्क के, जिनकी छतें ढलवाँ होती हैं। सफ़र देखे हैं, लंबी लकीरें जो कलाई से निकलकर अँगूठे की जड़ तक जाती हैं। झगड़े देखे हैं — दो बेलें जो आपस में उलझकर गाँठ बन जाती हैं — और सुलह भी। कुछ हथेलियों पर बीच में एक धब्बा उभरता है, गहरा, जिसके किनारे फैले होते हैं, और मैं जानती हूँ उसका मतलब, और उस दिन मैं दुल्हन की चुन्नी के पल्लू पर कुछ ज़्यादा ही सितारे टाँक देती हूँ, बिना पैसे लिए।
पर मैंने कभी कुछ नहीं बताया। ज़बान बंद।
* * *
ज़ोया की शादी फागुन में थी। वह पहली बार अपनी अम्मी और दो चचेरी बहनों के साथ आई, नाप देने और डिज़ाइन चुनने। बाईस बरस की, दुबली, बाल कसकर चोटी में बँधे, और उँगलियों पर नीली स्याही के दाग़ — वैसे दाग़ जो सिर्फ़ उन लड़कियों की उँगलियों पर होते हैं जो अब भी फ़ाउंटेन पेन से लिखती हैं।
उसकी अम्मी ने ही सारी बातें कीं। “दूल्हा दुबई में है, आपा, बड़ी कंपनी में। ख़ानदानी लोग हैं, हमारे ही मोहल्ले के थे पहले। शादी के बाद ज़ोया वहीं जाएगी। डिज़ाइन ऐसा चाहिए कि वीडियो में अच्छा आए, ‘अरबी वाला’ भी हो और ‘राजस्थानी’ भी।”
ज़ोया ने एक बार भी डिज़ाइन की किताब नहीं खोली। वह मेरी दुकान की दीवार पर टँगी उस पुरानी तस्वीर को देखती रही, जिसमें नानी जवान थीं और किसी नवाबी शादी में एक बेगम के हाथ पर मेहँदी लगा रही थीं।
“ये आपकी नानी हैं?” उसने पूछा।
“हाँ।”
“इनके हाथ बहुत ख़ूबसूरत हैं।” फिर, जैसे अपने आप से, “हाथ देखकर लगता है, इन्हें पता था कि ये क्या कर रही हैं।”
* * *
मेहँदी की रात मैं अपनी सबसे अच्छी मेहँदी लेकर गई — सोजत की पत्ती, दो बार छानी हुई, जिसे मैंने तीन दिन पहले भिगोया था और जिसकी ख़ुशबू में यूकेलिप्टस का तेल ऐसा घुला था जैसे बारिश के बाद नीम। घर में ढोलक बज रही थी। औरतें गा रही थीं — ‘मेहँदी है रचने वाली’ — और बच्चे सीढ़ियों पर ऊपर-नीचे भाग रहे थे।
ज़ोया को बीच वाले कमरे में गद्दे पर बिठाया गया था, पीले जोड़े में। मैंने उसकी हथेली अपने घुटने पर रखी और कोन चलाया। दो घंटे लगे। एक हाथ पर मोर, कमल, जाली, और बीच में एक छोटा-सा ख़ाली गोला, जिसमें दूल्हे का नाम छुपाना था — ‘फ़ैज़ान’, उर्दू में, बेलों के बीच। दूसरे हाथ पर डोली, कहार, और ऊपर उँगलियों पर बारीक जाल।
ज़ोया पूरे वक़्त चुप रही। बस एक बार, जब मैं ‘फ़ैज़ान’ लिख रही थी, उसकी उँगलियाँ ज़रा-सी सिकुड़ीं, जैसे किसी ने गुदगुदी की हो, या जैसे किसी ने चुटकी काटी हो।
फिर मैंने उसके हाथ पर नींबू-चीनी का पानी लगाया, और बैठकर इंतज़ार करने लगी।
* * *
मेहँदी सूखती है तो उसका रंग बदलता है — गीले हरे से भूरा, फिर उसके किनारे पपड़ी बनकर उठने लगते हैं। यही वह घड़ी होती है। मैं हमेशा उस वक़्त दुल्हन के पास रहती हूँ, कोई बहाना करके — कभी पल्लू ठीक करने के लिए, कभी चूड़ियाँ सरकाने के लिए।
ज़ोया की मेहँदी सूखी। और कुछ नहीं हुआ।
मैंने ग़ौर से देखा। मोर अपनी जगह था। कमल अपनी जगह। जाली अपनी जगह। कुछ नहीं सरका।
फिर, धीरे-धीरे, जैसे कोई गीले कपड़े से स्लेट पोंछ रहा हो, सब कुछ धुँधला होने लगा। मोर की गर्दन घुल गई। कमल की पंखुड़ियाँ एक-दूसरे में बह गईं। ‘फ़ैज़ान’ का ‘फ़े’ एक छोटी-सी बूँद बनकर हथेली की लकीर में उतर गया, और ग़ायब हो गया। पंद्रह मिनट में दोनों हथेलियों पर बस भूरी मेहँदी की एक चिकनी परत थी, बिना किसी डिज़ाइन के, जैसे किसी ने गीली मिट्टी में हाथ डुबोकर निकाल लिए हों।
और जब ज़ोया की ख़ाला ने उसे धुलवाने के लिए बाथरूम में ले जाकर पपड़ी उतारी, तो नीचे हथेलियाँ कोरी थीं। रंग तक नहीं चढ़ा था। बस हल्की-सी नारंगी झलक, जैसे सुबह की पहली धूप का शक।
औरतों में खुसुर-फुसुर हुई। “रंग नहीं आया? हाय अल्लाह, ये तो अच्छा शगुन नहीं।” “मेहँदी ख़राब होगी।” “सोजत वाली कहकर कहीं की भी उठा लाती हैं ये लोग।” ज़ोया की अम्मी का चेहरा उतर गया।
मैं कुछ नहीं बोली। ज़बान बंद। पर मेरे हाथ काँप रहे थे, और मैंने उन्हें दुपट्टे के नीचे छुपा लिया।
* * *
उस रात मैं सो नहीं पाई। सात सौ दुल्हनों में मैंने कभी कोरी हथेली नहीं देखी थी। नानी ने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया था। मेरे दिमाग़ में बस एक ही मतलब आता था — कोरी हथेली, यानी कोई नक़्शा नहीं, यानी कोई आगे की ज़िंदगी नहीं। मैंने सोचा, या अल्लाह, इस लड़की के साथ कुछ होने वाला है, और मुझे पता है, और मैं बता नहीं सकती।
तीन बजे मैं उठी और नानी का संदूक़ खोला। उसमें उनकी पुरानी कोन की पीतल की नलियाँ थीं, ज़र्दे की चाँदी वाली डिबिया, और एक काली जिल्द वाली डायरी, जिसमें वे दुल्हनों के नाम और तारीख़ें लिखा करती थीं। कुछ नहीं, बस नाम और तारीख़ें। पर एक पन्ने पर, सन् उन्नीस सौ बहत्तर के आसपास, एक नाम के आगे उन्होंने एक छोटा-सा गोला बनाया था, ख़ाली, और उसके नीचे लिखा था: “कोरा काग़ज़। अभी लिखा नहीं गया। लिखने दो।”
और उसके नीचे, कुछ साल बाद की स्याही में, उसी नाम के आगे: “आज आई थी। अपने बेटे की दुल्हन के लिए। डॉक्टर बन गई है।”
मैं संदूक़ के पास ज़मीन पर बैठी रही, और फ़ज्र की अज़ान तक हँसती रही, और रोती रही, और यह नहीं समझ पाई कि दोनों में से कौन-सा ज़्यादा।
* * *
ज़ोया की शादी नहीं हुई।
मुझे यह बात पूरे बाज़ार से पता चली, क्योंकि दरगाह बाज़ार में किसी की शादी टूटना वैसी ख़बर है जैसे किसी के घर में आग लगना — हर कोई धुआँ देखने आता है। निकाह से दो दिन पहले, ज़ोया ने अपने अब्बू के सामने बैठकर कहा था कि वह अभी शादी नहीं करना चाहती, कि उसे जयपुर के किसी कॉलेज में दाख़िला मिला है, जिसका ख़त उसने चार महीने से अपनी किताबों में छुपाकर रखा था, और कि वह जाना चाहती है।
किसी ने कहा, मेहँदी का रंग नहीं आया था, तभी तो। किसी ने कहा, ज़माना ख़राब है। मेरी दुकान पर दो हफ़्ते तक कम दुल्हनें आईं, और मैंने कुछ नहीं कहा।
जाने से पहले ज़ोया एक बार दुकान पर आई। अकेली। उसने मुझसे कुछ नहीं पूछा। बस अपनी हथेलियाँ मेरे सामने काउंटर पर रखीं, ऊपर की ओर खुलीं, और मुस्कराई। मैं भी मुस्कराई।
ज़बान बंद।
* * *
नौ बरस बाद, पिछले जाड़ों में, एक औरत मेरी दुकान पर आई — छोटे बाल, आँखों पर पतला चश्मा, कंधे पर लैपटॉप का थैला, और उँगलियों पर अब भी नीली स्याही के दाग़। उसके साथ कोई अम्मी नहीं थी, कोई चचेरी बहनें नहीं।
“आपा,” उसने कहा, “मेरी शादी है। अगले महीने। बेंगलुरु में। पर मेहँदी मुझे आपसे ही लगवानी है।”
मेहँदी की रात, उसके किराए के छोटे-से फ़्लैट में, जहाँ ढोलक की जगह ब्लूटूथ स्पीकर पर पुरानी ग़ज़लें बज रही थीं, मैंने ज़ोया से पूछा, “डिज़ाइन?”
उसने कहा, “आप बनाइए। जो आपको ठीक लगे। बस बीच में वो छोटा-सा गोला ख़ाली छोड़ दीजिए, जैसे पिछली बार था।”
“नाम नहीं लिखूँ?”
“नहीं। वह गोला मेरा है।”
मैंने बनाया। मोर नहीं, कमल नहीं। इस बार किताबों की एक क़तार बनाई, उसके ऊपर एक खिड़की, और खिड़की से बाहर एक बेल जो कलाई तक जाती थी और वहाँ एक दरवाज़ा खोलती थी। और बीच में वह गोला, ख़ाली।
फिर नींबू-चीनी का पानी। फिर इंतज़ार।
मेहँदी सूखी।
और मैंने देखा — पहली बार, अपनी पूरी उम्र में, सात सौ से ऊपर दुल्हनों के बाद — कि कुछ नहीं सरका। किताबें अपनी जगह रहीं, खिड़की अपनी जगह, बेल अपनी जगह। धुँधला भी कुछ नहीं हुआ। पर जो मैंने बनाया था, वह जस का तस, साफ़, गहरा होता चला गया, इतना गहरा कि भूरा कत्थई हुआ, और कत्थई लगभग काला। जैसे हथेली ने मेरा बनाया नक़्शा पढ़ा हो, और उस पर दस्तख़त कर दिए हों।
और बीच का गोला — मैंने देखा — अब ख़ाली नहीं था। उसमें बहुत बारीक, जैसे किसी फ़ाउंटेन पेन की नोक से, कुछ लिखा हुआ उभर आया था। मैंने उसे पढ़ा।
ज़ोया ने अपनी हथेलियाँ उठाकर रोशनी में देखीं, फिर मेरी ओर। “क्या दिख रहा है, आपा?”
मैंने उसकी कलाई पर अपनी उँगली रखी, हल्के से, और कहा, “ज़बान बंद।”
वह हँस पड़ी। मैं भी।
पर इतना बता दूँ — बस आपको, क्योंकि आप दुल्हन नहीं हैं — कि उस गोले में किसी दूल्हे का नाम नहीं था। उसमें ज़ोया की अपनी लिखावट थी।
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