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बैलों के नाम

By Anirudh Kalhans · अनिरुद्ध कलहंस

कहानी “बैलों के नाम” का चित्र

THE HOOK: सन् 1905 में जब छोटी रेल गोहद पहुँची, तो बैलगाड़ी वाले भग्गा ने भरी हाट में पगड़ी उतारकर उसे दौड़ की चुनौती दे डाली। मऊ के नाले तक जो पहले पहुँचे, वही असली।

गोहद के पुराने स्टेशन पर अब गाड़ी नहीं आती। पटरियाँ उखड़ चुकी हैं, और जहाँ कभी छोटी लाइन की पतली-पतली रेलें धूप में चमकती थीं, वहाँ अब बबूल उग आए हैं और बकरियाँ चरती हैं। पर स्टेशन की इमारत खड़ी है — पीली पुताई, खपरैल की छत, और बरामदे में एक लोहे की बेंच, जिस पर हर शाम रामसनेही बैठते हैं।

रामसनेही अट्ठासी बरस के हैं। आँखों पर मोटा चश्मा, सिर पर सफ़ेद अँगोछा, और हाथ में एक लाठी जिसकी मूठ पर पीतल की टोपी चढ़ी है। मोहल्ले के लड़के उन्हें ‘इस्टेसन वाले बब्बा’ कहते हैं। कभी कोई कॉलेज का लड़का मोबाइल लेकर आ जाता है कि बब्बा, पुरानी रेल के बारे में बताओ, और रामसनेही हँसते हैं।

“रेल के बारे में का बताएँ, भैया। रेल तो सबने देखी। हम तुम्हें बैलन के बारे में बताएँगे।”

* * *

सन् उन्नीस सौ पाँच की बात है, जब रामसनेही के बाबा भग्गा की मूँछें काली थीं और उसकी गाड़ी गोहद से ग्वालियर तक के रास्ते पर सबसे तेज़ चलती थी।

गाड़ी मतलब बैलगाड़ी। बबूल की लकड़ी की, जिसके पहियों पर लोहे की हाल चढ़ी थी और धुरी में अरंडी का तेल इतना पिलाया जाता था कि वह चलती तो चूँ तक न करती। आगे जुतते थे दो बैल — भूरा और सुग्गा। भूरा बड़ा था, शांत, खैरे रंग का, जिसके सींग पीछे की ओर मुड़े थे जैसे किसी बूढ़े पंडित की पगड़ी। सुग्गा जवान था, चितकबरा, और इतना नख़रेबाज़ कि उसे हरी घास के बिना पानी तक पसंद नहीं था।

भग्गा का काम था माल ढोना और सवारी ढोना। गोहद की हाट से गुड़ की भेलियाँ, कपास की गाँठें, सरसों के बोरे ग्वालियर के लश्कर बाज़ार तक; और लौटते में कपड़े के थान, मिट्टी का तेल, नमक, और कभी-कभी कोई बहू जो मायके से ससुराल जा रही होती, घूँघट में, जिसका भाई गाड़ी के पीछे-पीछे पैदल चलता। रास्ते में चुंगी का नाका पड़ता था, जहाँ मुंशी हर बोरे पर एक आना लेता था और भग्गा हर बार उससे झगड़ता था, और हर बार दोनों फिर बीड़ी बाँटकर पीते थे।

“भग्गा की गाड़ी में बैठे, तो समझो पहुँच गए,” लोग कहते थे।

फिर रेल आई।

* * *

छोटी रेल। नैरो गेज की, जो पहले ग्वालियर से भिंड की ओर बिछी, फिर उसकी शाखाएँ इधर-उधर फैलीं। डिब्बे इतने छोटे कि आदमी खिड़की से हाथ निकाले तो खेत की बाड़ छू ले, और इंजन इतना छोटा कि गाँव के बच्चे उसे ‘चाय की केतली’ कहते थे। पर वह केतली धुआँ उगलती थी, सीटी बजाती थी, और एक दिन में वह फेरा पूरा कर लेती थी जिसमें भग्गा को दो दिन लगते थे।

पहले साल भग्गा हँसा। “जा लोहे की बिल्ली,” उसने हाट में कहा था, “पटरी से उतर गई तो कौन उठाएगो? हमाओ भूरा उठाएगो?”

लोग हँसे भी। पर दूसरे साल गुड़ वाले लाला ने अपनी भेलियाँ रेल से भेजनी शुरू कर दीं। फिर कपास वाले ने। फिर वह बहू, जो हर साल मायके जाती थी, अपने भाई के साथ डिब्बे में बैठकर गई, और खिड़की से भग्गा की ओर हाथ हिलाया, जैसे किसी पुराने रिश्तेदार को हिलाते हैं, जिससे अब काम नहीं पड़ता।

तीसरे साल तक भग्गा की गाड़ी हफ़्ते में दो बार चलती थी, फिर एक बार। भूरा और सुग्गा को चने कम मिलने लगे। भग्गा की घरवाली, कलावती, ने एक दिन चूल्हे के पास बैठे-बैठे कहा, “रेल से कब तक लड़ोगे? पटरी पे कुली को काम मिलत है, ठेकेदार लोग रख रए हैं।”

भग्गा ने लोटा ज़मीन पर पटका। “भग्गा कुली बनेगो? बोझ ढोएगो लोहे की बिल्ली के लाने? ऐसो दिन आए से पहले हम—”

उसने वाक्य पूरा नहीं किया, क्योंकि उसे ख़ुद नहीं पता था कि वह दिन आने से पहले क्या करेगा।

* * *

पता उसे हाट में चला।

कार्तिक की हाट थी, गोहद में, और बड़ी भीड़ थी। रेल का बाबू, जो ठेकेदार का मुंशी था, तंबू के नीचे बैठा बता रहा था कि अगले महीने से माल के भाड़े में छूट होगी। भग्गा सुन रहा था, और उसके कान गर्म हो रहे थे। तभी किसी ने — बाद में कोई नहीं माना कि किसने — ठट्ठा किया, “भग्गा दादा, तुमाए बैल अब रेल के पीछे-पीछे दौड़बे लायक़ रह गए।”

और भग्गा ने पगड़ी उतारकर हाथ में ली, जो उसके इलाक़े में किसी बात पर क़सम खाने का ढंग था, और भरी हाट में कहा, “सुन लो सब। परसों सबेरे की गाड़ी जब गोहद से छूटेगी, हमाई गाड़ी भी छूटेगी। मऊ के नाले तक जो पहले पहुँचे, ऊ असली। रेल जीती तो भग्गा कुली बनेगो। भग्गा जीतो, तो जा मुंशी हमें बीस रुपैया देगो, और गोहद से कोई गुड़ रेल पे नईं जाएगो।”

मुंशी हँसते-हँसते तंबू से गिरते बचा। बीस रुपये उस ज़माने में बहुत होते थे। पर हाट ने तालियाँ बजाईं, और मुंशी को हाँ कहनी पड़ी, क्योंकि हाट में ‘ना’ कहने वाला डरपोक कहलाता है, चाहे वह रेल का आदमी ही क्यों न हो।

* * *

रेस वाले दिन आधा गोहद स्टेशन के आसपास जमा था। कुछ लोग मेढ़ों पर बैठे थे, कुछ पेड़ों पर। बच्चे अपनी माँओं की धोतियाँ खींच रहे थे। बनिया पैसे लगा रहा था — कोई कहता रेल जीतेगी, तो कोई कहता भग्गा का भूरा तो हाथी है, उसे कौन हराएगा। पंडित जी ने बैलों के माथे पर रोली का टीका लगाया, और कलावती ने, जो रेस के ख़िलाफ़ थी, चुपचाप भूरा के गले में एक नई घंटी बाँध दी।

भग्गा ने अपनी सबसे साफ़ धोती पहनी थी, और लाल पगड़ी। गाड़ी ख़ाली थी — कोई माल नहीं, बस भग्गा और उसका सोंटा, जिसे उसने बैलों पर कभी उठाया नहीं था, बस हवा में लहराता था।

उस दिन इंजन पर जो ड्राइवर था, उसका नाम था सुखलाल। बाईस-तेईस बरस का, भिंड के पास के किसी गाँव का, जिसके बाप ने खेत गिरवी रखकर उसे रेल के कारख़ाने में फ़ायरमैन का काम सिखवाया था। वह इंजन की खिड़की से झाँककर भीड़ को देख रहा था, और उसे समझ नहीं आ रहा था कि आज इतने लोग क्यों आए हैं। फिर किसी ने उसे बताया, और वह हँसा नहीं। उसने बस इंजन से उतरकर भूरा की पीठ पर एक बार हाथ फेरा, और भग्गा से कहा, “राम-राम दादा।”

“राम-राम,” भग्गा ने कहा, बिना उसकी ओर देखे।

सीटी बजी।

* * *

शुरू में रेल धीमी थी। छोटी लाइन की गाड़ियाँ स्टेशन से निकलते हुए ऐसे हाँफती थीं जैसे कोई बूढ़ा सीढ़ियाँ चढ़ रहा हो — छुक… छुक… छुक — और भग्गा की गाड़ी पहले सौ गज़ में ही आगे निकल गई। भीड़ चिल्लाई। लड़के मेढ़ों पर दौड़ने लगे। सुग्गा, जिसे भीड़ से नशा चढ़ता था, गर्दन ऊँची करके ऐसे भागा जैसे बारात के आगे नाच रहा हो।

रास्ता पटरी के साथ-साथ चलता था, कहीं सटकर, कहीं खेतों के पार। पहली मील भग्गा आगे रहा। दूसरी मील में रेल ने रफ़्तार पकड़ी, और खिड़कियों से मुसाफ़िर — जिनमें से आधे तो सिर्फ़ रेस देखने के लिए टिकट लेकर चढ़े थे — चिल्लाने लगे, “आ जा भग्गा! आ जा!” कोई अपने गमछे लहरा रहा था, कोई ताली बजा रहा था। एक बूढ़ी अम्मा ने खिड़की से भूरा की ओर एक रोटी फेंकी, जो सुग्गा ने हवा में ही लपक ली।

रेल आगे निकल गई। भग्गा ने पहली बार सोंटा हवा में ज़ोर से घुमाया, और कहा, “चल रे भूरा। चल रे बेटा।”

और भूरा चला।

तीसरी मील पर एक छोटा हॉल्ट था, जहाँ इंजन पानी लेता था। रेल वहाँ रुकी, और भग्गा की गाड़ी धूल उड़ाती हुई उसके बग़ल से निकल गई। डिब्बों से इतनी ज़ोर की हँसी और तालियाँ उठीं कि खेत में चरती भैंसें बिदक गईं। भग्गा ने पीछे मुड़कर देखा। सुखलाल इंजन पर खड़ा था, हाथ में पानी की नली, और वह — भग्गा ने यह बाद में कई बार बताया — मुस्करा रहा था। मज़ाक़ वाली हँसी नहीं, बल्कि वैसी, जैसे कोई अपने बाप को कुश्ती में जीतते देखकर मुस्कराए।

मऊ का नाला अब एक मील दूर था। पीछे रेल की सीटी बजी, फिर बजी, और धुएँ की लकीर पास आने लगी।

और तब, नाले से कोई तीन सौ गज़ पहले, एक बबूल के पेड़ के पास, भूरा के पैर लड़खड़ाए।

* * *

पहले उसका अगला घुटना मुड़ा, जैसे वह किसी को प्रणाम कर रहा हो। फिर पिछले पैर। जुआ एक ओर झुका, सुग्गा घबराकर रुका, और गाड़ी तिरछी होकर सड़क के किनारे की खाई में आधी उतर गई।

भग्गा कूदा। भूरा ज़मीन पर था, गर्दन जुए में फँसी, और उसकी साँस ऐसे चल रही थी जैसे लोहार की धौंकनी। मुँह से झाग। आँखें — बड़ी, काली, गीली — भग्गा को देख रही थीं, और उनमें कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सवाल, जिसे भग्गा पढ़ नहीं पाया।

“भूरा… भूरा रे… उठ बेटा…”

भग्गा ने जुआ खोला, हाथ काँप रहे थे, गाँठें नहीं खुल रही थीं। सुग्गा पीछे हटकर खड़ा था, और रँभा रहा था।

पीछे रेल की आवाज़ पास आई। धड़-धड़-धड़। भग्गा ने सिर नहीं उठाया। उसे अब रेस की परवाह नहीं थी, न बीस रुपये की, न हाट की, न गोहद के गुड़ की। उसे लगा कि आज, इसी बबूल के नीचे, उसकी सारी उमर किसी ने उसके हाथ से छीन ली है।

और फिर उसने सुना — ब्रेक की चीख़। लोहे पर लोहे की लंबी, दर्द-भरी चीख़, और भाप का एक बड़ा-सा ‘फ़्शश्श’।

रेल रुक गई थी। नाले से तीन सौ गज़ पहले, बबूल के पेड़ के ठीक सामने।

सुखलाल इंजन से कूदा, हाथ में पीतल की बाल्टी, जिसमें इंजन की टंकी का नहीं, अपने घड़े का ठंडा पानी था। वह दौड़ता हुआ आया, घुटनों के बल भूरा के पास बैठा, और उसका सिर अपनी गोद में ले लिया।

“दादा, पानी पिलाओ। धीरे-धीरे। मुँह में मत डालियो, होठ गीले करो।”

भग्गा ने बाल्टी से अँजुरी भरी। सुखलाल ने भूरा का जुआ एक झटके में खोल दिया — रेल के कारख़ाने में सीखे हाथ थे — और अपने गमछे से उसके मुँह का झाग पोंछा।

डिब्बों से मुसाफ़िर उतर आए। कोई नहीं चिल्लाया अब। कोई नहीं हँसा। एक-एक करके वे बबूल के नीचे जमा हुए, और खड़े रहे, जैसे किसी के घर मौत की ख़बर पर लोग खड़े होते हैं, यह न जानते हुए कि हाथ कहाँ रखें।

भूरा ने तीन घूँट पानी लिया। फिर उसने अपना भारी सिर ज़रा-सा उठाया, भग्गा के कंधे पर टिकाया, एक बार साँस छोड़ी — लंबी, गर्म, घास की गंध वाली — और फिर साँस नहीं ली।

* * *

रेल पौने घंटे वहाँ खड़ी रही। सुखलाल को उस दिन के लिए साहब से जुर्माना हुआ, और बाद में, रामसनेही बताते हैं, उसकी तरक़्क़ी दो साल रुकी रही। उसने कभी इसकी शिकायत नहीं की।

रेस किसी ने नहीं जीती। मुंशी ने बीस रुपये नहीं दिए, और भग्गा ने माँगे भी नहीं। गोहद का गुड़ रेल से जाता रहा।

भूरा को गाँव वालों ने नाले के किनारे गाड़ा, और कलावती ने उस पर एक दिया जलाया। सुग्गा अकेले गाड़ी नहीं खींच सकता था। अगले साल भग्गा ने उसे मेले में बेच दिया, और जिस दिन बेचा, उस रात घर नहीं लौटा।

तीसरे साल, बिना किसी से कुछ कहे, वह गोहद स्टेशन पर गया, और ठेकेदार के मुंशी के पास खड़ा हो गया। उसने अपनी लाल पगड़ी नहीं पहनी थी।

* * *

“कुली बने बाबा,” रामसनेही कहते हैं, और अपनी लाठी की पीतल वाली मूठ पर अँगूठा फेरते हैं। “तीस बरस। इसी इस्टेसन पे। बोझ ढोते रहे, उसी गाड़ी के लाने, जिससे रेस लगाई थी। सुखलाल ड्राइवर से दोस्ती हो गई थी। बाद में ऊ बड़ी लाइन पे चलो गओ, पर जब भी इधर आतो, बाबा के लाने भिंड की गजक लातो।”

जब रामसनेही छह-सात बरस के थे, बाबा उन्हें अपने कंधे पर बिठाकर प्लैटफ़ॉर्म के आख़िरी छोर तक ले जाते, जहाँ से पटरी खेतों में मुड़ती थी। वहाँ खड़े होकर, जब कोई गाड़ी नहीं आ रही होती, बाबा उन्हें नाम रटाते।

“बोल — भूरा।”

“भूरा।”

“सुग्गा।”

“सुग्गा।”

“कजरा। लखिया। बादल। मोहना।” ये वे बैल थे जो भूरा और सुग्गा से पहले बाबा के बाप के पास थे, और उनसे पहले बाबा के बाबा के पास। हर नाम के साथ एक क़िस्सा होता — कजरा जो साँप देखकर गाड़ी समेत तालाब में उतर गया था, लखिया जो एक बार चोरों को सींग मारकर भगा आया था, मोहना जिसकी घंटी की आवाज़ से पूरा गाँव जान जाता था कि भग्गा का बाप लौट आया।

“जे काहे याद करवाते थे बाबा?” रामसनेही ने एक बार पूछा था।

भग्गा ने बहुत देर तक पटरी की ओर देखा था। फिर कहा था, “रेल के डिब्बन पे नंबर लिखे रहत हैं, मोड़ा। ऊ कोई भूलेगो नईं। हमाए बैलन को कौन याद रखेगो?”

* * *

अब पटरी नहीं है। सन् दो हज़ार बीस के आसपास छोटी लाइन बंद हुई, और फिर एक दिन ट्रक आए और लोहा उखाड़कर ले गए। रामसनेही उस दिन बेंच पर बैठे रहे थे, और जब आख़िरी ट्रक गया, तब उठे।

कॉलेज वाला लड़का मोबाइल में कुछ लिख रहा है। रामसनेही उसकी ओर देखते हैं, फिर उस जगह की ओर, जहाँ पटरी खेतों में मुड़ती थी और जहाँ अब बबूल हैं।

“लिख लओ?” वे पूछते हैं।

“हाँ बब्बा। लिख रहा हूँ।”

“तो लिखो,” रामसनेही कहते हैं, और उनकी आवाज़ में वही लय आ जाती है जो अस्सी बरस पहले एक प्लैटफ़ॉर्म के छोर पर एक बूढ़े कुली की आवाज़ में थी।

“भूरा। सुग्गा। कजरा। लखिया। बादल। मोहना।”

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About the Author

Anirudh Kalhans (b. 1969) teaches history at a degree college in Gwalior and collects old railway tickets and coins from the Chambal region. His historical fiction follows ordinary people at the edges of big changes.

अनिरुद्ध कलहंस (जन्म 1969) ग्वालियर के एक डिग्री कॉलेज में इतिहास पढ़ाते हैं और चंबल अंचल के पुराने रेल टिकट और सिक्के जमा करते हैं। उनकी ऐतिहासिक कथाएँ बड़े बदलावों के किनारे खड़े साधारण लोगों के पीछे चलती हैं।

📍 Gwalior, India

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