2 जून 2071, नवा रायपुर
आज रात बारह बजे मेघ को बंद कर दिया जाएगा। चालीस दिन के लिए। वर्शन छह से सात। प्रेस विज्ञप्ति में लिखा है ‘निर्धारित उन्नयन’, और नीचे छोटे अक्षरों में, ‘इस अवधि में किसान भाई कृपया स्थानीय विवेक का प्रयोग करें।’ मुझे ‘स्थानीय विवेक’ पर हँसी आई। इकतीस साल से छत्तीसगढ़ का कोई किसान स्थानीय विवेक से नहीं, मेघ से पूछकर बोता है। मेघ हर गाँव के लिए, हर घंटे के लिए बता देता है कि पानी गिरेगा या नहीं, कितना, किस तरफ़ से। पिछले सीज़न उसकी राज्य-स्तरीय सटीकता इक्यासी प्रतिशत थी। इक्यासी प्रतिशत पर लोग भगवान को भी छोड़ देते हैं।
मंत्रालय का एक पुराना नियम है कि जब भी कोई ‘महत्वपूर्ण स्वचालित प्रणाली’ बंद हो, तो उस अवधि का ‘पारंपरिक पूर्वानुमान डेटा’ इकट्ठा किया जाए, रिकॉर्ड के लिए। तिवारी सर ने बताया कि ये नियम 2052 से है और इसकी फ़ाइलें आज तक किसी ने नहीं खोलीं। फिर उन्होंने सूची में सबसे नीचे वाला नाम देखा, जो मेरा था।
“धमतरी के पास एक गाँव है, डोंगरीपारा। चालीस दिन। पानी की बोतल रख लेना, अनुश्री। और ये मत समझना कि सज़ा है।”
मैंने नहीं समझा। अब समझ रही हूँ।
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4 जून 2071, डोंगरीपारा
बस हाईवे पर उतार देती है। आगे तीन किलोमीटर पैदल, या किसी की ई-रिक्शा। गाँव छोटा है — कोई सौ घर, एक पंचायत भवन, एक डबरी जिसमें इस वक़्त कीचड़ के सिवा कुछ नहीं, और गाँव के पीछे एक नीची, ऊँघती-सी पहाड़ी, जिससे इसका नाम पड़ा होगा। हर घर के दरवाज़े के पास दीवार पर एक हथेली भर की मेघ-पट्टी चिपकी है। आम दिनों में इस पर अगले चौबीस घंटों के बादल चलते हैं, नीले-सफ़ेद। आज हर पट्टी पर एक ही वाक्य है: ‘उन्नयन जारी है। असुविधा के लिए खेद है।’
पंचायत भवन के बाहर आठ-दस आदमी बैठे थे। सब उसी ख़ाली पट्टी को देख रहे थे, जैसे घूरने से वो पिघल जाएगी। मुझे सरकारी जैकेट में देखकर सरपंच रामेश्वर ध्रुव उठ खड़े हुए।
“आ गेव मैडम? बने करेव। त बतावव, रोपा कब लगाबो?”
मैंने कहा कि मैं बताने नहीं, पूछने आई हूँ। उनके चेहरे पर जो आया, वो निराशा से ज़्यादा उलझन थी, जैसे किसी ने कह दिया हो कि डॉक्टर आज मरीज़ से उसकी नब्ज़ पूछने आया है।
रात पंचायत भवन के कमरे में सोई। पंखा नहीं चला। बाहर कुछ कीड़े बोलते रहे, जिनके नाम मुझे नहीं पता।
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5 जून 2071
रामेश्वर जी ने बताया कि ‘पुराने ढंग’ से बताने वाली अब बस एक है — फूलबाई, गाँव के आख़िरी छोर पर, खपरैल वाले घर में। “पर ओ मन के बात ल अब कोनो नइ सुनय, मैडम। सियान हे।”
फूलबाई चौरासी साल की हैं। कद मेरे कंधे तक, हाथ जैसे सूखी जड़ें, और आँखें इतनी तेज़ कि मैंने अपना टैबलेट अनायास पीछे कर लिया। उनके घर की मेघ-पट्टी दीवार पर नहीं थी। वो चूल्हे के पास पड़ी थी, उलटी, और उस पर रखकर वो प्याज़ काट रही थीं।
“तोर मेघ ह सुत गे का?” उन्होंने बिना सिर उठाए पूछा, और फिर इतनी ज़ोर से हँसीं कि उनकी बहू भीतर से झाँक गई।
मैंने अपना परिचय दिया, योजना का नाम बताया, ‘पारंपरिक पूर्वानुमान डेटा’ भी कहा। उन्होंने सब सुना, फिर प्याज़ छोड़कर उठीं और मुझे आँगन की दीवार के पास ले गईं। दीवार की दरार से चींटियों की एक पतली, काली कतार ऊपर चढ़ रही थी। हर चींटी के मुँह में एक सफ़ेद दाना।
“देख, नोनी। चाँटी मन अपन अंडा ल धर के ऊपर चढ़त हें। तीन दिन म पानी गिरही।”
मैंने लिखा:
प्रविष्टि 1। स्रोत: चींटियाँ (अंडों का ऊपर की ओर स्थानांतरण)। पूर्वानुमान: लगभग 72 घंटों में वर्षा। विश्वास-स्तर: (फूलबाई से पूछा, उन्होंने कहा ‘पक्का’।)
भारतीय मौसम विभाग के पुराने औसत के हिसाब से इस इलाक़े में मानसून नौ-दस जून तक आता है। मैंने मन में तीन दिन के आगे एक सवालिया निशान लगा दिया।
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8 जून 2071
रात पौने तीन बजे पानी गिरा।
मैं उसकी आवाज़ से नहीं, गंध से जागी। खपरैलों पर पहली बूँदों से पहले ही कमरे में एक कच्ची, मीठी-सी महक भर गई थी, जैसे किसी ने ज़मीन का ढक्कन खोल दिया हो। मैं बरामदे में खड़ी होकर देखती रही। सुबह फूलबाई के यहाँ गई तो वो दातुन कर रही थीं। मुझे देखकर बस इतना कहा, “देखे?”
मैंने कहा, हाँ।
प्रविष्टि 1 के आगे मैंने हरा निशान लगाया और सवालिया निशान काट दिया।
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11 जून 2071
अब हर सुबह मैं फूलबाई के आँगन में बैठती हूँ, और वो मुझे अपनी ‘स्क्रीन’ दिखाती हैं।
मेचका, यानी मेंढक: जब डबरी के मेचका दिन में भी टर्राने लगें, तो पानी एक दिन के भीतर। टिटहरी: अगर वो ऊँची मेड़ पर अंडे दे, तो साल भारी होगा, नीचे दे तो कमज़ोर। पुरवाही, यानी पूरब की हवा: जब शाम को चले और उसमें नमी हो, तो रात में बरसेगा। और सबसे अजीब, माटी की महक। फूलबाई कहती हैं कि पानी आने से पहले भुइयाँ ख़ुद महकने लगती है, “जइसे लइका भूख लगे म रोथे।”
रात को मैंने अपने कमरे में बैठकर यह सब समझाने की कोशिश की। चींटियाँ वायुदाब में गिरावट को महसूस करती हैं, इस पर पुराने शोध-पत्र हैं। मेंढक नमी और दाब दोनों पर प्रतिक्रिया करते हैं। मिट्टी की गंध जियोस्मिन है, जो हवा में नमी बढ़ने पर ज़्यादा फैलती है। यानी फूलबाई के पास तीन-चार ज़िंदा, सस्ते, अपने-आप चार्ज होने वाले सेंसर हैं, और साठ साल का कैलिब्रेशन।
यह लिखकर मुझे अच्छा लगा। फिर बुरा लगा कि मुझे इसे विज्ञान की भाषा में लिखकर ही अच्छा लगा।
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15 जून 2071
आज मैंने वो किया जो शायद नहीं करना चाहिए था। रायपुर के सर्वर से रिमोट लॉगिन करके मेघ के पिछले सीज़न के लॉग निकाले, सिर्फ़ डोंगरीपारा वाले ग्रिड-सेल के।
मेघ दो किलोमीटर के ग्रिड पर सोचता है। डोंगरीपारा उस पहाड़ी की ओट में है, और पहाड़ी उसके सेल के ठीक बीच से गुज़रती है। पिछले सीज़न इस सेल के लिए मेघ के चालीस बड़े पूर्वानुमानों में से ग्यारह ग़लत निकले। उनमें से एक ठीक बियासी के वक़्त था: मेघ ने कहा भारी बारिश, किसानों ने नहर का पानी नहीं लिया, बारिश पहाड़ी के उस पार गिरकर चली गई। रामेश्वर जी ने एक बार बताया था कि पिछले साल धान ‘कमज़ोर’ हुआ था। उन्होंने मेघ का नाम नहीं लिया था। किसी ने नहीं लिया।
फूलबाई के अब तक चौदह पूर्वानुमान हैं। बारह सही, एक में एक दिन का फ़र्क़, एक ग़लत।
चौदह पूर्वानुमान कोई डेटासेट नहीं होते। मैं ये बात अपनी डायरी में तीन बार लिखती हूँ, ताकि रोमांटिक न हो जाऊँ।
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19 जून 2071
आज फूलबाई ने पहली बार मुझसे कुछ पूछा।
“तोर मेघ ह कहाँ ले देखथे?”
मैंने बताया — उपग्रह, समुद्र पर तैरते यंत्र, हर ज़िले में मौसम-स्टेशन, नब्बे करोड़ आँकड़े हर घंटे। मैंने आसमान की तरफ़ उँगली उठाकर दिखाया कि उपग्रह कहाँ होते हैं।
वो देर तक ऊपर देखती रहीं। फिर बोलीं, “अतेक दूर ले? त ओला चाँटी कइसे दिखही?”
मेरे पास कोई जवाब नहीं था। उन्होंने भी जवाब का इंतज़ार नहीं किया। बस हँसकर इतना कहा, “ओ ह ऊपर ले देखथे, मैं नीचे ले। दूनों ल मिला दे, त बने होही।”
दोपहर को रामेश्वर जी का बेटा टिकेश आया, सत्रह साल का, कान में ईयरपीस। उसने फूलबाई से पूछा कि पुरवाही किस तरफ़ से आती है। पूछते हुए वो थोड़ा शर्मिंदा था। फूलबाई ने उसके सिर पर हल्की चपत लगाई।
“पहिली मूड़ी ल ऊपर कर, बेटा। बाकी पाछू सिखाहूँ।”
मुझे याद आया कि रायपुर में मैंने आख़िरी बार आसमान कब देखा था। याद नहीं आया। वहाँ हम मौसम देखने के लिए खिड़की नहीं, कलाई देखते हैं।
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24 जून 2071
चार दिन से बादल घिरे हैं, काले, भारी, नीचे झुके हुए। गाँव में सबको यक़ीन है कि बस अब। आधे खेतों में थरहा उखाड़कर रोपा शुरू हो गया है। मैंने भी मान लिया था।
फूलबाई ने आँगन की दरार की तरफ़ इशारा किया। चींटियाँ अंडे नीचे उतार रही थीं।
“नइ गिरय, नोनी। छै-सात दिन नइ गिरय। बादर मन घूमे बर आय हें।”
मैंने लिखा, और अपने टैबलेट पर एक निजी शर्त भी लगाई, ख़ुद से: अगर कल तक बारिश हुई, तो मैं ये पूरी परियोजना एक दिलचस्प लोककथा मानकर फ़ाइल कर दूँगी।
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27 जून 2071
आज फूलबाई ग़लत निकलीं। कल शाम उन्होंने मेचका सुनकर कहा था कि रात में पहाड़ी की तरफ़ ‘थोरकुन’ पानी गिरेगा। नहीं गिरा। मैं सुबह थोड़ी झिझकते हुए उनके पास गई, जैसे किसी बुज़ुर्ग को उसकी ग़लती बतानी हो।
उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा। “मैं घलो चूकथों, नोनी। तोर मेघ घलो चूकथे। फरक अतके हे के मैं मान लेथों।”
फिर उन्होंने याद किया कि कल दोपहर पंचायत का दवा छिड़कने वाला ड्रोन डबरी के ऊपर तीन चक्कर लगाकर गया था। “मेचका मन डर गे रहिन होही। डरे मनखे घलो बने नइ बोलय।”
मैंने प्रविष्टि के आगे लाल निशान लगाया, और हाशिये पर लिखा: बाहरी व्यवधान — ड्रोन? सत्यापन संभव नहीं। लिखते हुए मुझे याद आया कि मेघ के लॉग में ग़लत पूर्वानुमानों के आगे कोई हाशिया नहीं होता। बस एक संख्या, जो औसत में घुल जाती है।
रात को टिकेश मुझे और फूलबाई को टॉर्च लेकर डबरी तक ले गया। हम मेड़ पर बैठे और अँधेरे में मेचका की आवाज़ें सुनते रहे। फूलबाई ने बताया कि छोटे वाले ‘टिर-टिर’ करते हैं और बड़े वाले ‘ढोंग-ढोंग’, और जब बड़े वाले पहले बोलें तो समझो पानी पास है। टिकेश ने अपने ईयरपीस से आवाज़ रिकॉर्ड करने की कोशिश की। फूलबाई ने कहा, रिकॉर्ड मत कर, सुन। उस रात बड़े वाले चुप रहे।
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1 जुलाई 2071
छह दिन बादल आसमान में टहलते रहे और एक बूँद नहीं गिरी। जिन्होंने रोपा लगा दिया था, वो डबरी से बाल्टियाँ ढो रहे हैं। टिकेश के घर वालों ने फूलबाई की बात मानी थी, उन्होंने रुककर कल रोपा लगाया, कल रात की पहली अच्छी बारिश से ठीक पहले।
आज टिकेश ने अपनी कॉपी में एक तालिका बनाई है। तारीख़, चींटियाँ, मेचका, पुरवाही, महक, पानी गिरा या नहीं। उसकी लिखावट मुझसे अच्छी है।
माँ का फ़ोन आया। पूछ रही थीं कि खाना ठीक मिल रहा है या नहीं, और मच्छर तो नहीं काटते। मैंने कहा, माँ, यहाँ मेंढक बताते हैं कि कल क्या होगा। माँ ने कहा, “धूप में ज़्यादा मत रहा कर।”
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10 जुलाई 2071
आख़िरी दिन। फूलबाई ने विदा में मुझे एक कपड़े की पोटली दी। खोला तो उसमें मिट्टी थी, उनके आँगन की।
“रायपुर म माटी हावय?”
“है दाई। गमलों में।”
वो इतना हँसीं कि खाँसी आ गई, और बहू को पानी लाना पड़ा। फिर उन्होंने मेरी हथेली अपनी सूखी जड़ों जैसी हथेली में लेकर कहा, “गमला ल घलो सूँघ लेबे कभू-कभू। ओहू बताथे।”
मेरी डायरी में अब इकतीस प्रविष्टियाँ हैं। छब्बीस सही, चौबीस घंटे के भीतर। तीन में एक दिन का फ़र्क़। दो ग़लत।
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12 जुलाई 2071, नवा रायपुर
आज सुबह छह बजे मेघ 7.0 जागा। प्रदेश के अड़तालीस हज़ार गाँवों में मेघ-पट्टियाँ एक साथ जल उठीं, नीले-सफ़ेद बादल फिर से चलने लगे। कंट्रोल रूम में तालियाँ बजीं। किसी ने लड्डू बाँटे।
मैंने अपनी रिपोर्ट तिवारी सर को दी। उन्होंने पहला पन्ना पढ़ा, दूसरे पर उनकी नज़र तालिका पर रुकी, और वो कुछ पल चुप रहे। फिर बोले, “बढ़िया है। फ़ाइल कर दो। मंत्रालय वाले ख़ुश होंगे।”
दोपहर को डेटा इंजीनियरिंग टीम का मेल आया। मेघ 8.0 के लिए नए मॉडल का इनपुट-स्कीमा शुक्रवार तक टिप्पणियों के लिए खुला है। मैंने स्कीमा खोला। दो हज़ार चार सौ बारह कॉलम। मिट्टी की नमी, पाँच गहराइयों पर। बंगाल की खाड़ी की सतह का तापमान। हवा में धूल के कण। एनडीवीआई। बादलों के ऊपरी सिरे की ठंडक।
मैंने सबसे नीचे एक नई पंक्ति जोड़ी।
कॉलम 2,413: चींटियाँ। विवरण: अंडों के स्थानांतरण की दिशा। स्रोत: फूलबाई, डोंगरीपारा; टिकेश ध्रुव की तालिका, 26 प्रविष्टियाँ। सेंसर: अभी नहीं।
डेटा-टाइप के ख़ाने पर मैं देर तक रुकी रही। ड्रॉपडाउन में ‘हाँ/ना’ सबसे ऊपर था।
मैंने ‘टेक्स्ट’ चुना। फूलबाई कहती थीं, चाँटी मन हाँ-ना म बात नइ करंय।
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