शेफ़ ने सिखाया—
नमक आख़िर में डालो,
चखकर,
ज़रूरत भर।
माँ के चूल्हे पर
नमक पहले पड़ता था,
अंदाज़े से,
मुट्ठी भर,
और कभी ग़लत नहीं होता था।
बारह साल हो गए
इस रसोई में।
अब मैं नमक
ग्राम में तौलता हूँ।
पर कभी-कभी
रात की आख़िरी शिफ़्ट में,
जब कोई नहीं देखता,
मैं अपने लिए
एक कटोरी दाल बनाता हूँ
और नमक
मुट्ठी से डालता हूँ।
थोड़ा ज़्यादा हो जाता है।
आँखों का नमक
उसमें
अलग से
मिल जाता है।
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