सत्रहवीं मंज़िल तक
हम रोज़ साथ जाते हैं—
मैं,
एक आदमी जो हमेशा
अपने जूतों से बात करता है,
एक लड़की जिसके इयरफ़ोन से
किसी और शहर की बारिश रिसती है,
और एक बुज़ुर्ग महिला
जो हर मंज़िल के बटन को
ऐसे देखती हैं
जैसे कोई पुराना ख़त।
चालीस सेकंड।
इतने में कभी
एक पूरा मोहल्ला बस जाता था—
दूध वाले की घंटी,
पड़ोसन का अचार,
किसी के बच्चे का नाम।
यहाँ आईने में
हम चारों
एक-दूसरे को नहीं,
अपने-अपने चेहरे को
ठीक करते हैं।
एक दिन लिफ़्ट अटक गई
नौवीं और दसवीं के बीच।
अँधेरे में
बुज़ुर्ग ने पूछा,
“बेटा, डर तो नहीं लग रहा?”
और तीन मिनट के लिए
हम सब
किसी के बच्चे हो गए।
फिर बत्ती लौटी,
दरवाज़ा खुला,
और हम
फिर से अजनबी होकर
अपने-अपने काम पर चले गए—
थोड़ा कम।





