मेरी रसोई की दीवार पर
दो घड़ियाँ हैं।
एक लेस्टर का समय बताती है,
दूसरी हल्द्वानी का।
बीच में साढ़े पाँच घंटे हैं—
जैसे कोई संकरी नदी
जिसे मैं रोज़
चाय के साथ पार करता हूँ।
जब यहाँ सुबह की धुंध होती है,
वहाँ माँ
दोपहर की धूप में
अचार की बरनियाँ
छत पर रख रही होती हैं।
जब मैं फ़ार्मेसी में
किसी अजनबी को
खाँसी की दवा समझा रहा होता हूँ,
वहाँ पापा
अपनी बीपी की गोली
भूल चुके होते हैं।
मेरी बेटी पूछती है,
“डैडी, दो टाइम क्यों?”
मैं कहता हूँ, “एक हमारा, एक दादी का।”
वह सोचती है,
फिर कहती है,
“तो दादी हमसे आगे जी रही हैं?”
हाँ, बेटा।
दादी हमसे आगे जी रही हैं—
हमसे पहले जागती हैं,
हमसे पहले सोती हैं,
और जब भी हम
उनके बारे में सोचते हैं,
वे वहाँ
पहले ही
हमारे बारे में सोच चुकी होती हैं।
कभी-कभी
मैं एक घड़ी
पाँच मिनट आगे कर देता हूँ—
ताकि लगे
दूरी थोड़ी कम है।
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