लौट आ फिर अब मेरी आए बहार-ए-ज़िंदगी,
क्या यूँ ही करता रहूँ इंतज़ार-ए-ज़िंदगी।
उम्र बस ख़ाली गुज़रती रही दम घुटता हें ,
क्या यूँ ही गुज़रेगी अब बेकरार-ए-ज़िंदगी?
कुछ तो मिलता जीने का मुझको भी एक आसरा
अब तो बाक़ी है फ़क़त इंतज़ार-ए-ज़िंदगी।
ख़्वाब आँखों में लिए बैठा रहता रात भर,
काश मिलती तो मुझे भी क़रार-ए-ज़िंदगी।
मुस्तफ़ा अपने ये दामन में क्या सँभालता
अब तो तुमने भी गँवाया वक़ार-ए ज़िंदगी।

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Mustafa khuje
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