पेड़ पे खुला एक स्कूल निराला,
गिलहरी दीदी ने उसको सँभाला।
पहला पाठ— “पूँछ सीधी रखना,
डाल-डाल पर फुदक के चलना।”
दूसरा पाठ— “दाने जमा करो,
सर्दी के दिन की चिंता करो।”
तीसरे पाठ में बात बड़ी प्यारी—
“मिल-जुल रहना, यही समझदारी।”
कौआ आया, बोला “काँव-काँव,
मुझको भी पढ़ना है, मैं भी आऊँ?”
“आओ भैया, बैठो डाली पर,
पर शोर न करना, सुनना ध्यान धर।”
तोता बोला, “मैं सब रट लूँ झटपट!”
दीदी बोलीं, “समझो, रटना है खटपट!”
छुट्टी की घंटी जब पत्ते बजाएँ,
सारे बच्चे घर को दौड़े जाएँ।
बच्चो, तुम भी सीखो ये बात—
पढ़ो समझकर, दिन हो या रात!





