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The Poetic Land

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गिलहरी का स्कूल

By Usha Gangwar · उषा गंगवार

पेड़ पे खुला एक स्कूल निराला,
गिलहरी दीदी ने उसको सँभाला।

पहला पाठ— “पूँछ सीधी रखना,
डाल-डाल पर फुदक के चलना।”

दूसरा पाठ— “दाने जमा करो,
सर्दी के दिन की चिंता करो।”

तीसरे पाठ में बात बड़ी प्यारी—
“मिल-जुल रहना, यही समझदारी।”

कौआ आया, बोला “काँव-काँव,
मुझको भी पढ़ना है, मैं भी आऊँ?”
“आओ भैया, बैठो डाली पर,
पर शोर न करना, सुनना ध्यान धर।”

तोता बोला, “मैं सब रट लूँ झटपट!”
दीदी बोलीं, “समझो, रटना है खटपट!”

छुट्टी की घंटी जब पत्ते बजाएँ,
सारे बच्चे घर को दौड़े जाएँ।

बच्चो, तुम भी सीखो ये बात—
पढ़ो समझकर, दिन हो या रात!

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About the Poet

Usha Gangwar is a homemaker and grandmother of three in Bareilly. She began writing rhyming poems for children at the kitchen table and still tests every one on her grandchildren before anyone else hears it.

उषा गंगवार बरेली में रहती हैं, गृहिणी हैं और तीन बच्चों की दादी-नानी। उन्होंने रसोई की मेज़ पर बच्चों के लिए तुकबंद कविताएँ लिखना शुरू किया और आज भी हर कविता सबसे पहले अपने पोते-पोतियों को सुनाकर परखती हैं।

📍 Bareilly, Uttar Pradesh, India
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