रेवा
इंदिरानगर की उस गली में, जहाँ एक तरफ़ फ़िल्टर कॉफ़ी की दुकान है और दूसरी तरफ़ एक मंदिर जिसकी घंटी हर आधे घंटे पर किसी ऑटो के हॉर्न से हार जाती है, ‘स्पिन सिटी’ नाम की एक सेल्फ़-सर्विस लॉन्ड्री है। छह वॉशिंग मशीनें, चार ड्रायर, एक बेंच, और दीवार पर एक बोर्ड: ‘कृपया अपने कपड़े मशीन में न छोड़ें। मशीन आपकी माँ नहीं है।’ ये बोर्ड मुझे बेंगलुरु की सबसे ईमानदार चीज़ लगता है।
हर इतवार शाम सात बजे मैं मशीन नंबर चार में कपड़े डालती हूँ। चार नंबर इसलिए, क्योंकि उसका ढक्कन बाक़ियों जितना नहीं चिल्लाता, और क्योंकि मैं भोपाल से हूँ, और हम लोग एक बार जिस चीज़ से मोहब्बत कर लें, उसे फिर छोड़ते नहीं। पुराने पुल, पुराने समोसे वाले, मशीन नंबर चार।
उस इतवार मशीन नंबर चार में किसी और के कपड़े घूम रहे थे। सब नेवी ब्लू। सात नेवी ब्लू शर्टें, और एक पीली टी-शर्ट, जो बीच में ऐसे घूम रही थी जैसे ग़लती से किसी और की बारात में आ गई हो।
मैंने बीस मिनट इंतज़ार किया। मशीन रुकी। कोई नहीं आया। पच्चीस मिनट। मम्मी का फ़ोन आया।
“खाना खाया?”
“हओ मम्मी।”
“क्या खाया?”
मैंने मशीन की तरफ़ देखा। “नेवी ब्लू।”
“क्या?”
तभी वो आया। हाँफता हुआ, हाथ में एक प्लास्टिक की बाल्टी, बाल गीले, जैसे नहाकर सीधा भागा हो। “सॉरी, सॉरी, सॉरी। ये आपकी मशीन थी क्या?”
“मशीन पर नाम तो नहीं लिखा,” मैंने कहा, ताकि लगे कि मुझे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। फिर अपने आप बोल पड़ी, “पर हाँ। चार नंबर मेरी है।”
उसने सारे कपड़े एक साथ बाल्टी में ठूँसे — सफ़ेद, नेवी, पीला, मोज़े, सब — और मेरी तरफ़ ऐसे देखा जैसे मैंने कोई क़ानूनी नोटिस थमाया हो। “नोट कर लिया। चार नंबर आपका। हम छह नंबर ले लेंगे, उसका ढक्कन चिल्लाता है, पर चलेगा।”
“हम”। पटना, मैंने मन में सोचा। मेरे ऑफ़िस में दो बिहारी हैं, और दोनों अकेले होकर भी ‘हम’ बोलते हैं, जैसे साथ में पूरा मोहल्ला लेकर चलते हों।
* * *
प्रियांशु
उस लड़की ने अपने कपड़े पाँच ढेरियों में बाँटे। सफ़ेद, हल्के रंग, गाढ़े रंग, नाज़ुक वाले, और एक ढेरी, जिसके बारे में मैं आज तक तय नहीं कर पाया कि वो किस आधार पर बनी थी। हर ढेरी के लिए अलग टेम्परेचर। मैंने अपनी ज़िंदगी में एक भी कपड़ा अलग से नहीं धोया। अम्मा कहती हैं, कपड़ा तो कपड़ा है, बउआ, आदमी थोड़े है कि उसका मन रखना पड़े।
अगले इतवार मैं ठीक सात बजे पहुँचा, और चार नंबर ख़ाली छोड़कर छह में कपड़े डाले। वो आई, चार नंबर ख़ाली देखा, और मेरी तरफ़ देखकर हल्का-सा सिर हिलाया, जैसे किसी दफ़्तर में फ़ाइल पास होती है।
तीसरे इतवार हम बात करने लगे। उसमें मेरा कोई कमाल नहीं था। अम्मा का फ़ोन आया था, और मैं स्पीकर बंद करना भूल गया था।
“बउआ, खाना खइलs?”
“हाँ अम्मा।”
“का खइलs?”
मैंने कुछ बोलने से पहले बेंच की तरफ़ देखा। वो हँस रही थी, मुँह पर हाथ रखकर।
फ़ोन रखा तो उसने कहा, “आपकी मम्मी भी दूसरा सवाल यही पूछती हैं? ‘क्या खाया’? पहले सवाल का जवाब उन्हें कभी काफ़ी नहीं लगता।”
“और तीसरा सवाल?” मैंने पूछा।
हम दोनों ने एक साथ कहा, “ठंड तो नहीं लग रही?” बेंगलुरु में। जहाँ साल भर पंखा तक मुश्किल से चलता है।
उसका नाम रेवा है। भोपाल। यूएक्स डिज़ाइनर। मैंने पूछा, यूएक्स मतलब? उसने कहा, “आप जब किसी ऐप में कोई बटन दबाते हो और वो वहीं होता है जहाँ आपकी उँगली ने सोचा था, वो मैं हूँ।” मुझे ये बहुत बड़ी बात लगी। मैं एक कंपनी में अकाउंट मैनेजर हूँ। मतलब जब किसी क्लाइंट का बटन वहाँ नहीं होता जहाँ उसकी उँगली ने सोचा था, तो फ़ोन मुझे आता है।
* * *
रेवा
अक्टूबर में चार इतवार आते हैं, और चारों इतवार हम मिले। ये बात मैं इसलिए लिख रही हूँ क्योंकि दिसंबर तक आते-आते मैंने इतवार को इतवार कहना छोड़ दिया था। मेरे लिए वो ‘लॉन्ड्री वाला दिन’ हो गया था, और फिर, धीरे-धीरे, बस ‘वो दिन’।
हम चालीस मिनट की धुलाई और पैंतालीस मिनट के ड्राई के बीच ढेर सारी बातें करते। खाने की बातें सबसे ज़्यादा। उसने बताया कि पटना में उसकी गली में एक आदमी जाड़े की सुबह अँगीठी पर लिट्टी सेंकता है, और उसका धुआँ इतना अच्छा होता है कि बच्चे स्कूल जाते-जाते रुक जाते हैं। मैंने उसे भुट्टे के कीस के बारे में बताया, सर्राफ़े की रात के बारे में, मम्मी के बनाए पोहे पर पड़ने वाली उस बारीक सेव के बारे में, जो बेंगलुरु में मिलती तो है, पर उसमें भोपाल नहीं होता।
एक इतवार वो एक स्टील का डिब्बा लेकर आया। उसमें ठेकुआ था, अम्मा का भेजा हुआ, कूरियर से, तीन दिन में आया था। “टूट गए हैं थोड़े,” उसने ऐसे कहा जैसे माफ़ी माँग रहा हो। टूटे हुए ठेकुए का स्वाद पूरे ठेकुए से अच्छा होता है, ये मैंने उसी दिन जाना। अगले इतवार मैं मावा बाटी लेकर गई, जो मम्मी ने ‘तेरी उस लॉन्ड्री वाली सहेली’ के लिए नहीं, मेरे लिए भेजी थी। मैंने मम्मी को ये नहीं बताया था कि सहेली नहीं, सहेला है।
हमने एक-दूसरे को कन्नड़ भी सिखाई, यानी जितनी हमें आती थी। उसे अपनी सोसाइटी के गार्ड से बस एक वाक्य आता था, ‘ऊटा आयता?’ — खाना खाया? “देखा,” उसने कहा, “यहाँ की अम्मा भी यही पूछती हैं।” मुझे ‘स्वल्प-स्वल्प’ आता था, थोड़ा-थोड़ा, और ‘गोत्तिल्ला’, मुझे नहीं पता। ऑटो वालों से पहला काम आता है, अपने बॉस से दूसरा।
हम अकेलेपन की बात नहीं करते थे। कम से कम सीधे नहीं। वो बताता कि उसके फ़्लोर पर बारह फ़्लैट हैं और वो उनमें से सिर्फ़ एक आदमी को पहचानता है, जो रोज़ सुबह लिफ़्ट में अपने कुत्ते से तमिल में बात करता है। मैं बताती कि मेरे ऑफ़िस में तीन सौ लोग हैं और कैंटीन में सब अपने-अपने लैपटॉप के सामने खाना खाते हैं, ताकि किसी को किसी के सामने अकेले खाते न दिखना पड़े। बेंगलुरु में सब कहीं और से आए हैं। इसलिए यहाँ कोई किसी से ये नहीं पूछता कि तुम कहाँ के हो। पूछ लो तो जवाब में एक पूरा शहर बाहर निकल आता है, और फिर उसे वापस अंदर रखना मुश्किल होता है।
एक दिन मैंने उससे कहा कि पूरे हफ़्ते में सबसे गरम चीज़, जिसे मैं छूती हूँ, वो ड्रायर से निकले कपड़े होते हैं।
वो हँसा। फिर उसने मेरी तरफ़ देखा और हँसना बंद कर दिया। क्योंकि मैं मज़ाक नहीं कर रही थी।
* * *
प्रियांशु
नवंबर के दूसरे इतवार वो नहीं आई।
मैंने छह नंबर में कपड़े डाले और चार नंबर ख़ाली छोड़ा। साढ़े सात बजे एक लड़का अपनी गठरी लेकर चार नंबर की तरफ़ बढ़ा, तो मैंने कहा, “भाई, वो किसी की है।” उसने मुझे ऐसे देखा जैसे मैं पागल हूँ, और सच कहूँ तो वो ग़लत नहीं था।
घर लौटकर मैंने अपने कपड़े बाल्टी से निकाले तो पाया कि मैंने उन्हें पहली बार दो ढेरियों में बाँटकर धोया था। सफ़ेद अलग, बाक़ी अलग। किसी ने देखा भी नहीं था।
उस रात मुझे पता चला कि मेरे पास उसका नंबर नहीं है। न इंस्टाग्राम, न सरनेम। सिर्फ़ एक नाम, एक शहर, एक मशीन का नंबर, और ये जानकारी कि वो पोहे पर सेव डालती है।
अगले इतवार वो आई, एक बड़े थैले के साथ। मम्मी की तबियत ख़राब थी, भोपाल गई थी, अब ठीक हैं। थैले में से उसने एक काँच का मर्तबान निकाला, आम के अचार का, और मेरी तरफ़ बढ़ा दिया।
“मम्मी ने भेजा है। मैंने उन्हें बता दिया था।”
“क्या बता दिया था?”
“कि सहेली नहीं है।”
मैंने लॉन्ड्री की पर्ची के पीछे अपना नंबर लिखा और उसके हाथ में रख दिया। उसने पर्ची को देखा, फिर मुझे, फिर कहा, “आपकी लिखावट डॉक्टरों जैसी है।”
“अम्मा भी यही कहती हैं। कहती हैं, डॉक्टर नहीं बना, बस लिखावट बन गई।”
* * *
रेवा
दिसंबर में बेंगलुरु में बारिश नहीं होनी चाहिए। उस इतवार हुई।
ड्रायर पर एक काग़ज़ चिपका था, हाथ से लिखा: ‘ड्रायर ख़राब। सॉरी। मंडे को आदमी आएगा।’ चारों ड्रायर। मेरे कपड़े गीले थे, धुले हुए, और मेरे बिल्डिंग की छत पर ताला था, क्योंकि मकान-मालिक अंकल मैसूर गए थे, चाबी लेकर, जैसे हर बार जाते हैं। मेरे कमरे में खिड़की है, बालकनी नहीं। मैं बाल्टी के सामने खड़ी होकर हिसाब लगा रही थी कि कितने कपड़े कुर्सी पर, कितने दरवाज़े पर, कितने पंखे से लटकाए जा सकते हैं।
“हमारी बालकनी है,” उसने कहा। फिर जल्दी से जोड़ा, “छोटी है। पर ऊपर छज्जा है। भीगेगा नहीं।”
उसका फ़्लैट चार गलियाँ दूर था। हमारे पास एक छाता था, उसका, जो उसने पूरा मेरी बाल्टी के ऊपर रखा, अपने ऊपर नहीं। दो गलियों के बाद हम दोनों पूरे भीग चुके थे, और हमारे धुले हुए कपड़े भी, जो पहले से गीले थे, तो उनका कोई नुक़सान नहीं हुआ। एक ऑटो वाले ने रुककर पूछा, “बरबेका?” आना है? उसने कहा, “बेडा, थैंक्यू,” और मुझे देखकर ऐसे मुस्कुराया जैसे उसने इम्तिहान में कोई मुश्किल सवाल हल कर लिया हो। ‘बेडा’ मैंने उसे सिखाया था। नहीं चाहिए।
उसके फ़्लैट में एक कमरा था, एक रसोई, और रसोई की अलमारी पर एक डिब्बा, जिस पर टेढ़ी-मेढ़ी हिंदी में लिखा था: ‘सत्तू — बउआ के लिए — सुबह पानी में घोल के पीना’। डिब्बे के बग़ल में एक छोटा-सा तुलसी का गमला था, जिसकी तीन पत्तियाँ पीली पड़ रही थीं।
“पानी ज़्यादा डालते हो,” मैंने कहा।
“अम्मा कहती हैं कम डालते हो।”
“दोनों ही ग़लत हैं, फिर।”
* * *
प्रियांशु
बालकनी सचमुच छोटी है। दो लोग उसमें तभी खड़े हो सकते हैं जब दोनों एक ही तरफ़ मुँह करें। हमने किया। बाहर बारिश की एक सीधी, धीमी परत गिर रही थी, और नीचे गली में किसी के घर से सांबर की ख़ुशबू आ रही थी।
रस्सी एक थी। उस पर मेरी पाँच नेवी ब्लू शर्टें पहले से टँगी थीं। उसने उन्हें सरकाया नहीं। अपने कपड़े उनके बीच-बीच में टाँग दिए। नेवी, हरा दुपट्टा, नेवी, पीला कुर्ता, नेवी। रस्सी पहली बार किसी कहानी जैसी लग रही थी।
क्लिप कम पड़ गईं। मेरे पास ग्यारह थीं। उसने एक क्लिप से अपना दुपट्टा और मेरी शर्ट की बाँह, दोनों साथ में दबा दिए।
“बचत,” उसने कहा।
मैंने रसोई में जाकर चूल्हे पर पानी चढ़ाया। सत्तू का डिब्बा मेरी तरफ़ देख रहा था, अपनी टेढ़ी लिखावट में। मैंने बालकनी की तरफ़ आवाज़ दी, अपनी सबसे अच्छी कन्नड़ में:
“ऊटा आयता?”
वो बालकनी के दरवाज़े पर खड़ी थी, बाल गीले, हाथ में ख़ाली बाल्टी। उसने एक बार रस्सी की तरफ़ देखा, जहाँ उसका दुपट्टा मेरी बाँह से बँधा टपक रहा था। फिर मेरी रसोई की तरफ़।
“इल्ला,” उसने कहा।
इस मौसम में कपड़े सूखने में कम से कम दो दिन लगेंगे। ये बात उसे भी पता थी, मुझे भी। हममें से किसी ने नहीं कही।
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