वो मेरे हिस्से की हर धूप सँभाल रखती है,
मेरी हर बात का माँ ख़याल रखती है।
मैं जब भी लौटता हूँ देर से, दरवाज़े पर
वो अपनी आँख में सौ-सौ सवाल रखती है।
हज़ार बार कहूँ, “ठीक हूँ मैं, अम्मी जान”,
वो मेरी आवाज़ में मेरा हाल रखती है।
मैं बाल रँगने लगा हूँ, नज़र भी कम है मगर,
वो मेरी उम्र अभी तक दस साल रखती है।
कभी न शिकवा किया उसने अपनी क़िस्मत से,
दबा के दिल में वो हर इक मलाल रखती है।
वो ईद हो कि हो होली, उसी रसोई में
सिवइयों के ही बग़ल में गुलाल रखती है।
‘शफ़क़’ मैं दुनिया की हर जंग जीत आऊँगा,
दुआ की ऐसी वो मुझ पर जो ढाल रखती है।
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