तमाम शहर में अपना मकाँ नहीं मिलता,
जो दिल की बात कहे, वो बयाँ नहीं मिलता।
गली-गली में हैं रौशन हज़ार विज्ञापन,
मगर चराग़ का कोई निशाँ नहीं मिलता।
किराए के इन्हीं कमरों में उम्र गुज़री है,
कहीं भी नीम-सा वो सायबाँ नहीं मिलता।
हर एक मोड़ पे मिलते हैं लोग हँसते हुए,
किसी की आँख में पर इत्मीनाँ नहीं मिलता।
ज़मीन बेच के ऊँची इमारतें तो बनीं,
परिंदा ढूँढता है, आसमाँ नहीं मिलता।
‘शफ़क़’ ये शाम भी ढल जाएगी कहीं चुपचाप,
किसी को अपना यहाँ राज़दाँ नहीं मिलता।





