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The Poetic Land

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मलाई गिलौरी

By Kavyanjali Mehrotra · काव्यांजलि मेहरोत्रा

कहानी “मलाई गिलौरी” का चित्र

THE HOOK: जिस सुबह शन्नो की बेटी ने स्कूल में टॉप किया, उस सुबह भी उसे चार घरों का झाड़ू-पोछा पूरा करना था। चारों घरों ने ख़बर अलग-अलग ढंग से सुनी — और चौथे घर में सन्नाटा था।

नतीजा सुबह दस बजे आना था, पर शन्नो के लिए सुबह साढ़े पाँच बजे ही आ चुकी थी, जैसे रोज़ आती है — नल की पहली टपक के साथ, पड़ोस के मुर्ग़े से पहले।

रिंकी रात भर करवटें बदलती रही थी। शन्नो ने उसे जगाया नहीं। चाय बनाई, दो रोटियाँ सेंककर डिब्बे में रखीं, और चुन्नी सिर पर डालते हुए बोली, “फ़ोन पर देख लेना, जो भी आए। हमें काम पर फ़ोन मत करना, मैडम लोग टोकती हैं।”

रिंकी ने आधी नींद में कहा, “अम्मा, अगर फ़ेल हो गई तो?”

“तो क्या, अगले साल फिर बैठना। दुनिया ख़तम नहीं हो जाएगी।” शन्नो ने दरवाज़ा भेड़ा। गली के मोड़ तक उसके होंठ बुदबुदाते रहे — बजरंगबली, दुनिया ख़तम नहीं होगी, पर फ़ेल मत करना।

* * *

पहला घर श्रीवास्तव मैडम का था, इंदिरा नगर के सी-ब्लॉक में, कोने वाला, जिसके गेट पर दो गमले हैं जिनमें कभी कुछ नहीं उगता। शन्नो ने झाड़ू उठाई ही थी कि सवा दस बजे उसका पुराना फ़ोन बजा, जिसकी स्क्रीन पर एक तिरछी दरार है जो रिंकी के चेहरे को दो हिस्सों में बाँट देती है।

उसने चुन्नी के पल्लू से हाथ पोंछकर फ़ोन उठाया। उधर से रिंकी कुछ बोल नहीं पा रही थी, बस हाँफ रही थी, फिर चीख़ी, “अम्मा! सत्तानबे दशमलव चार! स्कूल में फ़र्स्ट! मैम ने फ़ोन किया था!”

शन्नो झाड़ू हाथ में लिए खड़ी रह गई। उसे समझ नहीं आया क्या करे। हँसे तो मैडम सुन लेंगी, रोए तो पूछेंगी। उसने बस इतना कहा, “अच्छा… अच्छा। ठीक है। घर आकर बात करेंगे,” और फ़ोन रख दिया, जैसे कोई गरम बर्तन जल्दी से नीचे रख दिया जाता है।

पर श्रीवास्तव मैडम के कान बहुत तेज़ हैं। वह ड्रॉइंग रूम से आईं, गाउन के ऊपर शॉल लपेटे। “क्या हुआ शन्नो? रिज़ल्ट?”

“जी मैडम। आ गया।”

“कितने?”

“सत्तानबे… कुछ। स्कूल में फ़र्स्ट आई है।”

मैडम का मुँह खुला रह गया, फिर पूरा चेहरा एक बड़ी मुस्कान में फैल गया। “अरे वाह! अरे वाह! देखा, मैं कहती थी न, लड़की तेज़ है! मैंने ही तो तुमसे कहा था कि उसे सरकारी में मत डालो, वो मिशन वाले स्कूल में डालो। याद है?”

शन्नो को याद था कि मैडम ने ऐसा कुछ नहीं कहा था। मिशन वाले स्कूल का पता रिंकी की सहेली की माँ ने दिया था, और फ़ीस के लिए शन्नो ने अपने कान की बालियाँ गिरवी रखी थीं। पर उसने सिर हिला दिया।

मैडम ने फ़ोन उठाया। “हेलो, मिनी? सुन, हमारी शन्नो है न, हमारे यहाँ काम करती है, उसकी बेटी ने टॉप किया है! हाँ हाँ! हमने ही तो गाइड किया था… अरे बिल्कुल, पुरानी किताबें भी तो हमने ही दी थीं, गुड्डू वाली।”

शन्नो पोछा लगाती रही। गुड्डू की पुरानी किताबें नौवीं की थीं, और उनमें आधे पन्ने गुड्डू ने क्रिकेट के स्कोर लिखकर भर दिए थे। रिंकी ने उन पन्नों पर सफ़ेद काग़ज़ चिपकाकर दोबारा नोट्स बनाए थे।

जाते वक़्त मैडम ने कहा, “शाम को एक फ़ोटो भेजना उसकी, मार्कशीट के साथ। व्हाट्सऐप ग्रुप में डालूँगी।” फिर, जैसे कुछ याद आया हो, “और कल थोड़ा जल्दी आ जाना, मेहमान आ रहे हैं।”

* * *

दूसरा घर बाजपेयी मैडम का था, दो गली आगे। वहाँ बात पहले से पहुँच चुकी थी। मोहल्ले में ख़बर हवा से तेज़ चलती है, और श्रीवास्तव मैडम हवा से भी तेज़।

बाजपेयी मैडम रसोई के दरवाज़े पर खड़ी होकर बोलीं, “सुना तुम्हारी बेटी ने बड़े नंबर लाए हैं।”

“जी, मैडम।”

“हूँ।” मैडम ने टमाटर की टोकरी उसकी तरफ़ सरकाई। “आजकल तो नंबर ऐसे ही बँटते हैं, प्रसाद की तरह। हमारे ज़माने में साठ परसेंट वाला मोहल्ले में मिठाई बाँटता था। अब तो नब्बे वाले को कोई पूछता नहीं।”

शन्नो ने टमाटर धोने शुरू किए।

“और ये मिशन वाले स्कूल, इनकी तो कॉपियाँ भी ढीली जाँची जाती हैं। हमारे पिंटू के स्कूल में तो टीचर एक-एक नंबर के लिए रुलाते हैं।” मैडम ने एक पल रुककर पूछा, बहुत हल्के से, जैसे पूछना ज़रूरी न हो, “मैथ्स में कितने आए?”

“सौ, मैडम।”

बाजपेयी मैडम कुछ नहीं बोलीं। वह भीतर चली गईं, और थोड़ी देर बाद शन्नो ने सुना, वह फ़ोन पर किसी से कह रही थीं, “पिंटू का बस थोड़ा सा रह गया, पेपर ही टफ़ था इस बार…”

उस दिन बाजपेयी मैडम ने बर्तन दो बार धुलवाए। एक कड़ाही पर, उनके हिसाब से, तेल का निशान रह गया था। शन्नो ने उसे फिर से माँजा, और फिर से, और कड़ाही इतनी चमकी कि उसमें शन्नो को अपना चेहरा दिखा — पसीने से भीगा, और फिर भी, कहीं बहुत भीतर, मुस्कुराता हुआ।

* * *

तीसरा घर मिसेज़ रिज़वी का था, जो अब अकेली रहती हैं। उनके बेटे-बहू बेंगलुरु में हैं और साल में एक बार ईद पर आते हैं, और वह भी हर साल नहीं। मिसेज़ रिज़वी अस्सी के पार हैं, रिटायर्ड प्रिंसिपल, और उनकी आँखें अब कमज़ोर हैं, पर कान नहीं।

शन्नो ने दरवाज़ा खोला ही था कि उन्होंने अपनी कुर्सी से पुकारा, “शन्नो! यहाँ आओ। पहले यहाँ आओ, झाड़ू बाद में।”

शन्नो गई। मिसेज़ रिज़वी ने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए, उनकी उँगलियाँ पतली थीं, ठंडी, और बहुत मज़बूत।

“सुना मैंने। बाजपेयी की महरी ने बताया। सत्तानबे दशमलव चार।” उन्होंने हर अंक ऐसे बोला जैसे कोई शेर पढ़ रही हों। “मैथ्स में पूरे सौ। माशाअल्लाह। माशाअल्लाह।”

शन्नो की आँखें, जो अब तक सूखी थीं, एकदम से भर आईं। उसे ख़ुद नहीं पता था कि इन्हें किस बात का इंतज़ार था।

“रोओ मत, बेवक़ूफ़,” मिसेज़ रिज़वी ने कहा, ख़ुद अपनी आँखें पोंछते हुए। “अब आगे क्या? साइंस? इंजीनियरिंग? मुझसे पूछना, मैं बताऊँगी कहाँ फ़ॉर्म भरना है, कौन-सी स्कॉलरशिप है। चालीस बरस यही तो किया है मैंने। और सुनो, उसे एक दिन यहाँ लाना। मैं देखना चाहती हूँ उस लड़की को जिसने सौ में सौ लिए।”

उस दिन शन्नो ने मिसेज़ रिज़वी के घर में सबसे धीरे काम किया। हर कोना साफ़ किया, जैसे वह घर उसका अपना हो। जाते वक़्त मिसेज़ रिज़वी ने एक लिफ़ाफ़ा देने की कोशिश की। शन्नो ने हाथ जोड़ दिए। “नहीं अम्मी, ये नहीं। आपने जो कहा, बहुत है।”

मिसेज़ रिज़वी ने लिफ़ाफ़ा वापस रख लिया। समझदार औरतें समझ जाती हैं कि कब देने से छोटा कर दिया जाता है।

* * *

चौथा घर सक्सेना साहब का था। बड़ा घर, गेट पर चौकीदार, भीतर दो गाड़ियाँ। आम तौर पर यहाँ टीवी चलता रहता है, और सक्सेना मैडम फ़ोन पर किसी किटी पार्टी का हिसाब करती रहती हैं।

आज घर चुप था।

चौकीदार ने गेट खोलते हुए धीरे से कहा, “आज ज़रा आराम से। बेबी का रिज़ल्ट…” और उसने हाथ से एक इशारा किया, नीचे की तरफ़।

शन्नो के भीतर कुछ सिमट गया।

सक्सेना मैडम रसोई में थीं, खड़ी-खड़ी चाय के कप में चम्मच घुमा रही थीं, बहुत देर से, क्योंकि चाय ठंडी हो चुकी थी और उस पर मलाई की परत जम गई थी। उन्होंने शन्नो को देखा, सिर हिलाया, और कुछ नहीं कहा। ऊपर के कमरे से न कोई आवाज़ आ रही थी, न गाना, न फ़ोन की घंटी।

शन्नो ने काम शुरू किया। उसने झाड़ू इतनी हल्की चलाई कि फ़र्श को भी पता न चले। बर्तन ऐसे धोए कि पानी भी धीरे गिरे।

आधे घंटे बाद सक्सेना मैडम ने ही बात शुरू की, बिना उसकी तरफ़ देखे। “तुम्हारी बेटी का भी तो आया होगा आज।”

शन्नो का हाथ रुक गया। उसके भीतर सत्तानबे दशमलव चार ने सिर उठाया, बिल्कुल वैसे जैसे सुबह से हर घर में उठा था। उसने उसे वापस दबा दिया।

“जी मैडम। पास हो गई।”

“अच्छा है।” मैडम ने कहा, और फिर बहुत देर बाद, जैसे ख़ुद से, “तनु दो सब्जेक्ट में… सुबह से दरवाज़ा बंद करके बैठी है। उसके पापा ने कुछ कह दिया।”

शन्नो ने कुछ नहीं कहा। वह जानती थी कि इस समय कोई भी शब्द, कितना भी नरम, ग़लत जगह गिरेगा।

जब वह ऊपर के कमरों में पोछा लगाने गई, तो तनु के दरवाज़े के बाहर एक प्लेट रखी थी, जिसमें सुबह का नाश्ता वैसा ही पड़ा था। शन्नो ने प्लेट उठाई, नीचे ले जाने के लिए, फिर रुकी। उसने दरवाज़े पर दो बार धीरे से खटखटाया।

“तनु बेबी, पराठा ठंडा हो गया है। गरम करके ले आऊँ?”

भीतर से कोई जवाब नहीं आया। फिर एक भर्राई हुई आवाज़: “शन्नो दीदी… रिंकी का क्या आया?”

शन्नो ने प्लेट पकड़े-पकड़े दरवाज़े की लकड़ी को देखा, जिस पर किसी पुराने स्टिकर का आधा निशान बचा था।

“पास हो गई, बेबी। आप भी हो जाओगी। अगली बार। दुनिया ख़तम नहीं होती।”

थोड़ी देर बाद दरवाज़े की कुंडी खुली। तनु ने प्लेट ली, बिना ऊपर देखे, और दरवाज़ा फिर बंद हो गया। पर इस बार कुंडी नहीं लगी।

* * *

चारों घर ख़त्म होते-होते डेढ़ बज गया। धूप तीखी थी, और सड़क पर ऑटो वालों के हॉर्न आपस में बहस कर रहे थे। शन्नो के पैर दुख रहे थे, जैसे रोज़ दुखते हैं। आज कुछ नया नहीं था, सिवाय इसके कि सब कुछ नया था।

चौराहे पर ‘गुप्ता मिष्ठान भंडार’ के शीशे के पीछे मिठाइयाँ धूप में चमक रही थीं — काजू कतली, मोतीचूर, मलाई गिलौरी, जिसके लिए लखनऊ में लोग दूर-दूर से आते हैं। सुबह से तीन घरों में किसी ने मिठाई की बात की थी, और किसी ने मिठाई नहीं दी थी। शन्नो को इसकी शिकायत भी नहीं थी। मिठाई माँगी नहीं जाती।

वह दुकान में घुसी। काउंटर पर खड़ा लड़का फ़ोन में कुछ देख रहा था।

“भैया, एक मलाई गिलौरी।”

“एक? डिब्बा नहीं बनाऊँ? आधा किलो, पाव भर?”

“एक।”

लड़के ने कंधे उचकाए, एक गिलौरी उठाकर काग़ज़ के छोटे से दोने में रखी, और उस पर चाँदी का वर्क़ थोड़ा टेढ़ा चिपका रहा था। चालीस रुपये। शन्नो ने चुन्नी के कोने में बँधी गाँठ खोली और गिन-गिनकर पैसे दिए।

रिंकी के लिए शाम को घर पर सूजी का हलवा बनेगा, घी वाला, जैसे हर तीज-त्योहार पर बनता है। पड़ोसियों के लिए बताशे बँटेंगे। पर यह गिलौरी किसी के लिए नहीं थी।

दुकान से निकलकर वह चौराहे के किनारे नीम के पेड़ के नीचे खड़ी हो गई, जहाँ थोड़ी छाँव थी और कोई उसे नहीं देख रहा था। उसने दोना खोला। चाँदी का वर्क़ धूप में एक पल को चमका।

उसने पहला कौर लिया, धीरे से, आँखें बंद करके। मलाई उसकी जीभ पर ऐसे घुली जैसे बरसों से किसी ने उसका इंतज़ार किया हो।

सत्तानबे दशमलव चार, उसने मन में कहा, किसी को सुनाए बिना।

फिर उसने दोना मोड़ा, कूड़ेदान में डाला, चुन्नी ठीक की, और घर की तरफ़ चल पड़ी। रास्ता वही था। पैर वही दुख रहे थे। पर वह आज पहली बार किसी चीज़ का स्वाद अपने मुँह में लिए घर लौट रही थी।

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About the Author

Kavyanjali Mehrotra (b. 1984) teaches Hindi at a girls' inter college in Lucknow's Aminabad. She writes about the families of old Lucknow mohallas, especially the women who keep the accounts nobody else reads.

काव्यांजलि मेहरोत्रा (जन्म 1984) लखनऊ के अमीनाबाद में लड़कियों के एक इंटर कॉलेज में हिंदी पढ़ाती हैं। पुराने लखनऊ के मोहल्लों के परिवार, और ख़ासकर वे औरतें जिनका हिसाब कोई नहीं पढ़ता, उनकी कहानियों के केंद्र में रहते हैं।

📍 Lucknow, India

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