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बीस सुइयाँ

By Gulnaz Shervani · गुलनाज़ शेरवानी

कहानी “बीस सुइयाँ” का चित्र

THE HOOK: चालीस बरस से हर सुबह सलमा बी अपने बूढ़े दर्ज़ी शौहर के लिए बीस सुइयाँ पिरोती हैं। जिस सुबह वे बीमार पड़ती हैं, रहमत को पहली बार ख़ुद एक सुई पिरोनी पड़ती है — उन आँखों से जो अब नाका नहीं देखतीं।

रहमत अली की आँखें अब धागे का सिरा नहीं देखतीं। कपड़ा देखती हैं, नाप देखती हैं, ग्राहक का चेहरा धुँधला-सा देख लेती हैं, पर सुई का नाका उनके लिए वैसा हो गया है जैसे रात के आसमान में कोई तारा, जो देखो तो है, ग़ौर करो तो नहीं।

इसलिए हर सुबह, फ़ज्र के बाद, जब चाय का पानी चढ़ता है, सलमा बी बीस सुइयाँ पिरोती हैं।

बीस। न कम, न ज़्यादा। सफ़ेद धागा, काला, ख़ाकी, और एक-दो रंगीन, उस दिन के काम के हिसाब से। वे चारपाई पर बैठकर, खिड़की की रोशनी की ओर मुँह करके, धागे का सिरा होंठों से गीला करती हैं, उसे दो उँगलियों में ऐंठकर नुकीला बनाती हैं, और एक ही बार में नाके में उतार देती हैं। फिर हर सुई को रहमत के कुर्ते की ऊपर वाली जेब पर, एक क़तार में, टाँक देती हैं — जैसे किसी फ़ौजी के सीने पर तमग़े।

“आज बीस से ज़्यादा मत तोड़ना,” वे कहती हैं।

“आज बीस से कम में काम हो जाएगा,” रहमत कहते हैं।

चालीस बरस से यही बातचीत है। दरगाह बाज़ार की गली में उनकी दुकान पर दोपहर तक जेब ख़ाली हो जाती है, और दोपहर को सलमा बी टिफ़िन लेकर आती हैं, और टिफ़िन के साथ दस सुइयाँ और।

* * *

उस सुबह चाय का पानी नहीं चढ़ा।

सलमा बी करवट लिए लेटी थीं, रज़ाई ठुड्डी तक, और उनकी साँस में एक घरघराहट थी जो रात भर रहमत के कान में चलती रही थी, जैसे पुरानी मशीन का पैडल। माथा तपता हुआ। “ज़रा देर में उठती हूँ,” उन्होंने कहा, और आँखें नहीं खोलीं।

रहमत ने चाय ख़ुद बनाई। उसमें चीनी दो बार डल गई। फिर वे खिड़की के पास बैठे, सुई और धागे की रील लेकर।

धागे का सिरा होंठों से गीला किया। दो उँगलियों में ऐंठा। सुई को रोशनी की ओर उठाया।

कुछ नहीं दिखा।

उन्होंने आँखें सिकोड़ीं, चश्मा माथे पर चढ़ाया, फिर नाक पर उतारा। धागा नाके के आसपास भटकता रहा, कभी ऊपर, कभी नीचे, जैसे कोई बच्चा अँधेरे में माँ को टटोल रहा हो। पाँच मिनट। दस। उँगलियाँ काँपने लगीं।

फिर रहमत ने आँखें बंद कर लीं।

पचपन बरस पहले, जब वे उस्ताद हमीदुल्ला के यहाँ शागिर्द थे, उस्ताद ने उनसे कहा था, “दर्ज़ी आँख से नहीं, पोर से सीता है, मियाँ। आँख तो धोखा देती है।” तब उन्हें यह बात शायरी लगी थी।

उन्होंने बाएँ हाथ के अँगूठे और तर्जनी के बीच सुई को कसकर थामा, और दाएँ अँगूठे के पोर से उसके नाके को छुआ। एक छोटी-सी, ठंडी, लंबोतरी ख़ाली जगह, जिसकी धार बाल से भी पतली। उन्होंने उस ख़ाली जगह को अपने पोर में बिठाया, जैसे कोई किसी का पता याद करता है। फिर धागे का गीला सिरा उसी पोर के सहारे, उसी रास्ते पर, धीरे से —

धागा नाके से निकला, और दूसरी ओर उनकी उँगलियों में आ गया।

रहमत देर तक बैठे रहे, उसे पकड़े हुए, जैसे कोई मछली पकड़ ले और समझ न आए कि अब उसका क्या करे।

उस दिन उन्होंने दुकान नहीं खोली। बस एक सुई पिरोई।

फिर वे उठे, सलमा बी के सिरहाने गए, और उस सुई को — सफ़ेद धागे वाली, अकेली — उनके तकिये के गिलाफ़ पर, उनके कान के पास, बहुत सँभालकर टाँक दिया।

एक तमग़े की तरह।

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About the Author

Gulnaz Shervani (b. 1990) runs a small mehndi and tailoring shop in the bazaar lanes of Ajmer. She writes short, strange stories in the gaps between brides, often about hands, threads and the things that patterns remember.

गुलनाज़ शेरवानी (जन्म 1990) अजमेर के बाज़ार की गलियों में मेहँदी और सिलाई की एक छोटी दुकान चलाती हैं। दुल्हनों के बीच मिले ख़ाली वक़्त में वे छोटी, अनोखी कहानियाँ लिखती हैं — अक्सर हाथों, धागों और उन बातों के बारे में जो नक़्शे याद रखते हैं।

📍 Ajmer, India

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